झारखंड का अद्भुत दुर्गा मंदिर, 16 दिनों तक मनाया जाएगा नवरात्रों का त्योहार

जनादेश/रांची: मां दुर्गा की उपासना के लिए सोमवार 26 सितंबर को नवरात्र का कलश स्थापित होगा। सुबह 6.11 बजे से 7.51 मिनट तक शुभ मुहूर्त है। इस दिन से नवरात्र शुरू हो जाएगा। चहुंओर भक्ति का माहौल नजर आने लगा है। घर से लेकर बाजार तक भक्ति में सराबोर होने के लिए तैयार हैं। देश के अन्य राज्याें की तरह झारखंड में भी इसका उत्साह देखते बन रहा है। कोरोना काल के बाद पहली बार झारखंड में बड़े पैमाने पर दुर्गापूजा की तैयारी की गई है। झारखंड में कई दुर्गा मंदिर हैं। इन मंदिरों की अपनी अपनी कहानी भी है। आज आपको एक अद्भुत दुर्गा मंदिर की कहानी से रूबरू करा रहे हैं।

झारखंड के नक्सल प्रभावित लातेहार जिले का प्रखंड मुख्यालय है चंदवा। यहां से करीब दस किलोमीटर दूर जब आप आगे बढ़ेंगे तो रांची चतरा मार्ग पर एक प्राचीन मंदिर है। इसे लोग मां उग्रतारा नगर मंदिर के नाम से जानते हैं। हजारों साल प्राचीन यह मंदिर की कई कहानियां हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से खास बनाती हैं। यह मंदिर मंदागिरि पहाड़ पर है। इस दुर्गा मंदिर के प्रति हर कोई अटूट आस्था रखता है। इसे लोग शक्तिपीठ भी कहते हैं। यहां 16 दिनों तक नवरात्र मनाने की परंपरा है। जबकि देश में हर जगह नवरात्र केवल 9 दिनों का ही होता है।

मां उग्रतारा नगर मंदिर में देश के कई राज्यों से माता भक्त हजारों की संख्या में आते हैं। झारखंड ही नहीं, यहां पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार के अलावा मध्य प्रदेश से भी लोग नवरात्र में पूजा करने आते हैं। यहां जितिया पर्व के ठीक दूसरे दिन से मां दुर्गा की पूजा शुरू हो जाती है। यहां नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापना के बाद अष्टभुजी माता की पूजा की जाती है। इसी साल चंद माह पहले झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी यहां पूजा करने गए थे। यहां घंटों उन्होंने पूजा-अर्चना की थी। ऐसी मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। यहां लाल पुष्प चढ़ाने की परंपरा है।

झारखंड के इस प्राचीन दुर्गा मंदिर में विजयादश्मी का त्योहार 16 दिन पूजा के बाद मनाया जाता है। यहां विजयादशमी पर माता को पान चढ़ाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इसकी भी एक रोचक कहानी है। धूमधाम से माता के आसन पर पान चढ़ाने के बाद लोग इसे गिरने की प्रतीक्षा करते हैं। जब पानी गिर जाता है तो लोग यह समझ लेते हैं कि माता ने विदाई की अनुमति प्रदान कर दी है। इसके बाद विशेष पूजा की शुरुआत होती है। हर दो घंटे के अंतराल पर माता की आरती की जाती है। अगर पान नहीं गिरता है तो विसर्जन नहीं किया जाता है। कई बार ऐसा हुआ है कि काफी प्रतीक्षा के बाद पान गिरा है।

यहां के लोक समाज में इस मंदिर की एक कहानी प्रचलित है। कहा जाता है कि यह मंदिर सैकड़ों साल प्राचीन है। एक समय यहां एक राजा हुआ करते थे। वह शिकार खेलने के लिए जंगल में गए थे। मनकेरी जंगल, जो लातेहार में ही है। राजा को बड़े ही जोरों की प्यास लगी। कारवां रोककर वह प्यास बुझाने के लिए एक तालाब के पास रुके। तालाब में पानी पीने के दौरान उनके हाथ में देवी की प्रतिमा आ गई। राजा कुछ समझ नहीं पाए। उन्होंने प्रतिमा को उसी तालाब में डाल दिया। फिर कारवां लेकर आगे बढ़ गए। उस रात राजा ने सपने में देखा कि माता दुर्गा अपनी प्रतिमा को महल में पहुंचाने के लिए कह रही हैं। सुबह हुई तो राजा को इशारा समझ में आ गया। उन्होंने प्रतिमा लाकर अपने महल में स्थापित कर दिया। वहां एक मंदिर भी बना दिया। उस जमाने में यहां हर कार्य हेतु कर्मचारी नियुक्त रहते थे।

इस गौरवशाली मंदिर की एक और विशेषता है। यहां हर दिन यानी 365 दिन चावल और दाल का भोग ही लगाया जाता है। यह पूजा के लिए आने वाले भक्तों को यही भोग वितरित किया जाता है। हर दिन दोपहर में पुजारी माता की प्रतिमा को उठाकर रसोई घर में पहुंचाते हैं। यहां भोग लगाया जाता है। इसके बाद पुन: प्रतिमा को मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। ऐसी परंपरा झारखंड के किसी मंदिर में देखने को नहीं मिलेगी।

ऐसी मान्यता है कि एकबार रानी अहिल्याबाई बंगाल की यात्रा पर जा रही थीं। इसी बीच उन्हें इस प्राचीन मंदिर के बारे में पता चला। इस मंदिर का किस्सा सुनकर वह हैरान रह गईं। इसके बाद उन्होंने यहां पहुंचकर पूजा करने की योजना बनाई। फिर अपने कारवां के साथ वह यहां पहुंचीं। यहां घंटों उन्होंने पूजा की। गांव के लोग भी यह किस्सा पुरखाें के हवाले से सुनाते हैं।