काहे मजदूरों को घर जाने की छूट देने को मजबूर हुई सरकार? समझने की जरूरत !

अभय कुमारः केन्द्र सरकार तो चाहती ही नहीं थी कि कारखानों में काम करनेवाले मजदूर अपने घर, अपने गांव चले जाएं? शायद यही वजह है कि मजदूर दिवस के कुछ दिनों पहले तक भी मजदूरों को घर जाने की इजाजत नहीं मिली थी? यह बात अलग है कि लाखों मजदूर इससे पहले ही बगैर हवाई जहाज, बगैर रेल और बगैर बसों के पैदल-पैदल ही अपने गांव पहुंच गए! लाकॅडाउन का समय गुजरता गया और मजदूर दिवस करीब आ गया! केन्द्र सरकार को लगा कि मजदूरों के साथ ऐसा व्यवहार?
कहीं सरकार की बदनामी न हो जाए, लिहाजा मजदूर दिवस से दो-तीन दिन पहले मजदूरों पर मेहरबान हो गई केन्द्र सरकार और उन्हें घर जाने की छूट मिल गई. लेकिन, तब भी बड़ा सवाल रेल का था? पहले तो केन्द्र नेे साफ मना कर दिया, परन्तु जब बिहार से उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने परेशानी बताई, तो केन्द्र सरकार को समस्या समझ में आ गई और श्रमिक रेल को मंजूरी मिल गई! रेल भाड़े की महाभारत तो सबको पता ही है. केन्द्र सरकार पर भरोसा करें तो 85 प्रतिशत पैसा केन्द्र की ओर से देने का आदेश जारी किया गया था.
यह बात अलग है कि यह आदेश सामने, प्रेस के सामने भी तब आया, जब हंगामा हुआ? मजदूरों को सबसे बड़ा फायदा हुआ विदेश में फंसे भारतीयों के कारण? केन्द्र सरकार पहले चरण में विदेशों से कई भारतीयों को ला चुकी थी और अभी हजारों भारतीयों को लाना है, यदि मजदूरों को छूट दिए बगैर इन्हें लाया जाता तो केन्द्र सरकार का तो असली सियासी चेहरा ही उभर कर सामने आ जाता, इसलिए मजबूरी में मजदूरों को घर जाने की छूट दी गई? आखिर, मजदूर एक वोट से ज्यादा दे भी क्या सकते हैं?