उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है एक ‘रुद्रनाथ मंदिर’।

जनादेश/उत्तराखंड: चौथा पंचकेदार रुद्रनाथ मंदिर

मंदिर हमारी आस्था का केंद्र होते हैं और भगवान पर हमारे अटूट विश्वास का आधार भी प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़ी पौराणिक कथाएँ और उनकी रहस्यमयी चमत्कारी शक्तियाँ ही हैं जो हमारी आस्था को और अधिक दृढ़ बनाती हैं। प्रत्येक प्राचीन धार्मिक स्थल की कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य है जो ईश्वर की सत्ता का आभास कराती है। ऐसे ही धार्मिक स्थलों में एक है देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित ‘रुद्रनाथ मंदिर’। रुद्रनाथ मंदिर भगवान शिव जी को समर्पित धार्मिक स्थल है।

वैसे तो अधिकांश जगह भगवान शिव की आराधना के लिए उनके प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की आराधना की जाती है किंतु पूरे विश्व में यह एक ही मंदिर है जहाँ शिव जी के एकानन अर्थात् मुख की पूजा की जाती है। रुद्रनाथ मंदिर पंचकेदारों में से एक केदार कहलाता है। हिन्दू ग्रन्थ कहते हैं कि यदि कोई इन पंचकेदारों के एक बार दर्शन कर ले तो उसके सारे कुल और पूर्वजों का तरण हो जाता है। समुद्रतल से 2290 मीटर की ऊँचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले के जंगलों व पहाड़ों के बीच में एक गुफा में स्थित है। इसे पंचकेदारों में से एक क्यों कहा जाता है इसके पीछे एक पौराणिक कथा है।

पंचकेदारों के पीछे की पौराणिक मान्यता-

मान्यता है कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने के उपरांत विजयी पांडवों को गोत्र हत्या और ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु श्रीकृष्ण जी ने उन्हें भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कहा। अत: स्वर्गारोहण के समय पांडव अलकनंदा के किनारे-किनारे पद यात्रा करते हुए जब इस क्षेत्र में पहुँचे तब उन्होंने शिव जी के दर्शन के लिए अलग-अलग स्थानों पर शिव स्तुति की। परंतु त्रिनेत्रधारी भगवान शिव उनसे बहुत क्रुद्ध थे इसलिए महिष का रूप धारण करके पशुओं के झुण्ड में मिल गए।

स्वर्गारोहण के लिए पांडव जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, वह जगह-जगह भगवान शिव की आराधना करते जा रहे थे, लेकिन भगवान शिव आस-पास होकर भी उनके समक्ष नहीं आए। इस बात का आभास पांडवों को तब हुआ जब वे घूमकर गुप्तकाशी के नजदीक पहुँचे और वहाँ उन्होंने जानवरों के मध्य महिष को देखा।

महिष रूप में भगवान शिव ही हैं, ऐसा सोचकर भीम ने दो शिलाओं के मध्य अपने पैर फैला दिए और पांडवों ने जानवरों को हाँककर भीम की ओर कर दिया, जिससे जानवर उनके दोनों टाँगों के बीच से जाने लगे लेकिन महिष रूपी भगवान जहाँ थे वहीं धरती में समाने लगे। उन्हें पृथ्वी में समाते देखकर भीम समझ गए कि वह भगवान शिव ही हैं। अत: उन्होंने उस महिष को पीछे से पकड़ लिया। फलस्वरूप भगवान शिव अन्तर्ध्यान हो गए और उनके शरीर के पाँच भाग नेपाल सहित उत्तराखंड के पाँच विभिन्न स्थानों पर निकले।  तदुपरांत पांडवों ने उन पाँचों स्थानों पर मंदिरों का निर्माण करके उनमें शिवलिंग की स्थापना की। इन्हीं पाँचों शिव मंदिरों को पंचकेदार के नाम से जाना जाता है। तथा नेपाल के काठमांडू में पशुपतिनाथ में उनके संपूर्ण शरीर की पूजा की जाती है।

भीम के द्वारा पकड़े जाने से महिष के पीछे का भाग जिस स्थान पर रह गया था, उसे केदारनाथ के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर बैल के वक्ष और कटि के मध्य का भाग प्रकट हुआ उसे मदमहेश्वर के नाम से वक्ष और भुजा के प्राकट्य स्थल को तुंगनाथ मंदिर, अग्र भाग अर्थात् मुख जहाँ प्रकट हुआ उसे रुद्रनाथ तथा जटाओं के प्रकट होने के स्थल को कल्पेश्वर के नाम से जाना जाता है।

अत: केदारनाथ, मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर इन पंचकेदारों में रुद्रनाथ मंदिर को चौथे पंचकेदार के रूप में जाना जाता है।

प्राकृतिक संरचनात्मक विशेषता

मंदिरों का निर्माण तत्कालीन शासकों द्वारा उनकी सम्पन्नता के आधार पर वास्तुकला के अनुसार करवाए जाते रहे हैं, किन्तु रुद्रनाथ मंदिर एक प्रकृति प्रदत्त गुफा में स्थित है, 

दुनिया चमत्कार को ही नमस्कार करती है, फिर ईश्वर अपनी रहस्यमई शक्तियों से दुनिया को चमत्कृत न करें तो उनके अस्तित्व पर विश्वास करना कठिन हो जाएगा। रहस्यों की श्रृंखला की एक कड़ी रुद्रनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग है, एक किंवदंती के अनुसार यहाँ पर भगवान शिव के महिष रूपी अवतार का मुख प्रकट हुआ था, इसीलिए इसे स्वयंभू शिवलिंग के नाम से जाना जाता है, इसके अलावा इस शिवलिंग को ‘रुद्रमुख’ और ‘नीलकंठ महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। रुद्रनाथ शिवलिंग एक महिष मुख की आकृति का है जिसकी गर्दन टेढ़ी है। यह कृत्रिम न होकर प्राकृतिक शिवलिंग है, जिसकी गहराई आज तक रहस्य बनी हुई है क्योंकि आज तक इसकी गहराई का पता नहीं लगाया जा सका है। दर्शनाभिलाषी भक्तगण दूर-दूर से इसी के दर्शन करने आते हैं।

मंदिर के आसपास और भी कई छोटे-छोटे मंदिर हैं, जो पाँचों पांडवों, माता कुंती, और माता द्रौपदी को समर्पित हैं तथा पास ही वैतरणी कुण्ड में शक्ति स्वरूप पूजी जाने वाली शेषशायी विष्णु जी की मूर्ति भी है। इसके साथ ही वहाँ आसपास और कुछ दूरी पर कुल मिलाकर छह कुण्ड हैं, जिन्हें नारद कुण्ड, सरस्वती कुण्ड, तारा कुण्ड, सूर्य कुण्ड, चंद्र कुण्ड और मानस कुण्ड के नाम से जाना जाता है।

भक्तगण यहाँ नारद कुण्ड में स्नान करने के पश्चात् ही रुद्रनाथ भगवान के दर्शन करते हैं।

आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य-

रुद्रनाथ के आसपास का अलौकिक वातावरण बेहद मनमोहक है, चारों ओर का वातावरण हरियाली से परिपूर्ण है, जगह-जगह सुंदर फूलों की चादर बिछी नजर आती है। 

रुद्रनाथ मंदिर के सामने से नन्दा देवी, त्रिशूल और नंदा घुंटी की हिमाच्छादित चोटियाँ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देती हैं। आसपास बहने वाले झरने व कुण्ड भी यहाँ के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं। रुद्रनाथ मंदिर चमोली जिले के सगर गाँव से 20 किलोमीटर की दूरी पर है, जहाँ का रास्ता पैदल चलकर पार करना पड़ता है।

मंदिर तक जाने का मार्ग अल्पाइन व बुरांश के जंगलों और पेड़ों से घिरा हुआ है जहाँ हिमालयी मोर, अठखेलियाँ करते हुए रंग-बिरंगे मोनाल और मृग जैसे जंगली जानवर दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त रास्ते में जगह-जगह बिना पूँछ वाले वाले शाकाहारी चूहे भी फुदकते दिखाई पड़ते हैं। यहाँ की घाटियों में भोजपत्र के वृक्ष तथा ब्रह्मकमल की बहुतायत है। मंदिर की चढ़ाई के मार्ग में प्राकृतिक झरने व गुफाएँ भी देखने को मिलते हैं। चढ़ाई के मार्ग को बुग्याल कहते हैं, बुग्याल का अर्थ होता है- हरियाली से ढका हुआ क्षेत्र, और यहाँ तो जिधर दृष्टि जाती है उधर हरियाली की चादर बिछी नजर आती है। यह मंदिर एक गुफा के अंदर ही स्थित है, जो इसे अनोखा रूप प्रदान करता है।

रुद्रनाथ यात्रा का क्रम

रुद्रनाथ की यात्रा आरंभ करने के लिए तीन ट्रैकिंग स्थल हैं- सगर रुद्रनाथ ट्रैक, मंडल रुद्रनाथ ट्रैक तथा हेलंग रुद्रनाथ ट्रैक। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार इनमें से किसी भी ट्रैक से रुद्रनाथ मंदिर तक की यात्रा करते हैं। 

उत्तराखंड के हिल स्टेशनों में एक ऐतिहासिक गोपेश्वर मंदिर है। यह गोपीनाथ मंदिर के रूप में लोकप्रिय है। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है ऐतिहासिक लौह त्रिशूल। इस त्रिशूल को अद्वितीय माना जाता है, इसी कारण रुद्रनाथ मंदिर के दर्शनार्थी इस मंदिर और इस अलौकिक त्रिशूल के भी दर्शन अवश्य करते हैं। तत्पश्चात् गोपेश्वर से सगर तक बस से जाते हैं। बस यात्रा का यह अंतिम पड़ाव होता है। यहाँ से मंदिर के लिए पैदल ही यात्रा करके चढ़ाई की जाती है। सगर से मंदिर की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है यहाँ से लगभग चार किलोमीटर की चढ़ाई के बाद उत्तराखंड के सुंदर बुग्यालों की यात्रा प्रारंभ होती है।

पुंग बुग्याल से ट्रैकिंग प्रारम्भ करके चढ़ाई करते हुए पित्रधार नामक स्थान पर पहुँचते हैं। बीच में लिती बुग्याल वह पनार बुग्याल आते हैं, जहाँ पर यात्री खाने-पीने के लिए रुकते हैं या फिर एक दिन रुककर वहाँ कै प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हैं।

सगर गाँव से पनार बुग्याल की दूरी लगभग 12 किलोमीटर है, फिर यहाँ से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर पित्रधार है, जहाँ भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए पत्थर घंटियाँ चुनरियाँ आदि देखने को मिलते हैं। पित्रधार  पर पहुँचकर चढ़ाई खत्म हो जाती है और उतार प्रारंभ हो जाता है। यहाँ से मंदिर की दूरी 5 किलोमीटर रह जाती है। यहाँ पर शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यात्री यहाँ पर अपने पितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। यहाँ से मंदिर के मार्ग में धलाब्नी मैदान आता है। मंदिर तक जाते हुए रास्ते में तरह-तरह के पुष्पों के सुगंध फूलों की घाटी का आभास देते हैं।

दूसरा ट्रैक है मंडल रुद्रनाथ ट्रैक, इस मार्ग से भी रुद्रनाथ मंदिर जाते हैं। ट्रैकिंग के इस मार्ग में माता अनुसूया का मंदिर आता है। अत: इस ट्रैक से वही श्रद्धालु यात्रा करते हैं जो माता अनुसूया के मंदिर भी जाने के इच्छुक होते हैं। गोपेश्वर से मंडल गाँव की दूरी 12 से 14 किलोमीटर है। माता अनुसूया का मंदिर इस ट्रैक के बीच लगभग 2 किलोमीटर अलग रास्ते पर है। श्रद्धालु पहले माता अनुसूया के मंदिर में दर्शन करके आते हैं उसके बाद रुद्रनाथ मंदिर के लिए ट्रैकिंग शुरू करते हैं।

मंडल गाँव से माता अनुसूया मंदिर तक आना-जाना लगभग 4-5 किलोमीटर है जिसमें 3 से 4 घंटे का समय लगता है, तत्पश्चात् रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा प्रारंभ करते हैं। हंसा बुग्याल, धनपाल मैदान व नोला पास से होते हुए लगभग 23 किलोमीटर की दूरी तय करके रुद्रनाथ मंदिर पहुँचते हैं।

इसके अतिरिक्त एक अन्य मार्ग से भी ट्रैकिंग करके रुद्रनाथ मंदिर पहुँचा जा सकता है, इसे हेलंग रुद्रनाथ ट्रैक के नाम से जाना जाता है। यह रुद्रनाथ मंदिर का सबसे लंबा ट्रैक है, इसकी दूरी लगभग 45 किलोमीटर मीटर है। किन्तु इसकी एक विशेष बात यह है कि इस मार्ग से जाते हुए पंचकेदारों में से एक और केदार ‘कल्पेश्वर महादेव’ के दर्शन करने का अवसर भी मिलता है, जो उर्गम गाँव के आसपास आता है।

हेलंग ट्रैक जोशीमठ के पास है, यहाँ से यात्रा प्रारंभ करके भक्तगण उर्गम गाँव पहुँचते हैं। वहाँ से कल्पेश्वर महादेव तक जाने के लिए एक छोटा सा ट्रैक करना पड़ता है। तत्पश्चात् कल्पेश्वर महादेव पहुँचकर वहाँ दर्शन करके रुद्रनाथ मंदिर के लिए यात्रा शुरू करते हैं और पल्ला, किमानाकल्गोंत और दुमक होते हुए रुद्रनाथ मंदिर पहुँचा जाता है। इस यात्रा के मध्य में बंसी नारायण का मंदिर भी आता है, इच्छुक श्रद्धालु बंसी नारायण मंदिर में दर्शन करके आगे की यात्रा करते हैं।

रुद्रनाथ मंदिर जाने के लिए उचित मौसम-

देवभूमि के इस देवस्थल का ही नहीं बल्कि सभी पंचकेदारों का मौसम वर्ष भर ठंडा रहता है, यहाँ गर्मियों में भी हल्की ठंड का अहसास होता है और सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है, जिसके कारण वहाँ के रास्ते बंद हो जाते हैं। उस समय मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है और मंदिर से भगवान शिव के प्रतीकात्मक स्वरूप को नीचे 20 किलोमीटर दूर गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है और छह माह तक वहीं उनकी नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। छह माह गोपीनाथ मंदिर में निवास करने के उपरांत मई माह में हिन्दी कैलेंडर के अनुसार एक निश्चित तिथि को रुद्रनाथ डोली यात्रा के द्वारा महादेव को रुद्रनाथ मंदिर में पुन: स्थापित कर दिया जाता है। 

महादेव के प्रतीकात्मक स्वरूप को पालकी में बैठाकर बड़ी धूमधाम से उनकी डोली यात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा गोपीनाथ मंदिर से शुरू होकर सगर गाँव होते हुए पित्रधार पहुँचती है। वहाँ पर पितरों की पूजा-आर्चना के पश्चात् यात्रा आगे बढ़ती है। रुद्रनाथ मंदिर पहुँचने के बाद वहाँ के स्थानीय लोग वनदेवी की पूजा करते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस पूरे स्थल की रक्षा वनदेवी के द्वारा ही की जाती है, इसलिए वहाँ के स्थानीय निवासियों में वनदेवी के प्रति अटूट श्रद्धा है तथा प्रत्येक धार्मिक और शुभ कार्यों का आरंभ वन की पूजा-अर्चना से किया जाता है।

डोली यात्रा के अतिरिक्त रुद्रनाथ मंदिर में प्रत्येक वर्ष सावन के महीने में एक विशाल आयोजन किया जाता है। यह अधिकतर रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित किया जाता है इस आयोजन में स्थानीय लोग ही भाग लेते हैं, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और उस दौरान संपूर्ण क्षेत्र भक्तिमय तो होता ही है साथ ही उत्सव के रंग में रंगा हुआ चारों ओर उल्लास से भरा हुआ दिखाई देता है ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान रुद्रनाथ से छह महीनों की दूरी का सारा संताप मिटाकर सारी खुशियाँ एक ही दिन में प्रकट कर लेना चाहते हैं। 

रुद्रनाथ पहुँचने के लिए परिवहन के साधन- 

हवाई यात्रा- वर्तमान समय में रुद्रनाथ पहुँचने के लिए परिवहन के सभी साधन उपलब्ध हैं।  हवाई यात्रा करके रुद्रनाथ मंदिर तक पहुँचने के लिए गोपेश्वर से सबसे नजदीक हवाई अड्डा देहरादून का ग्रांट जाली हवाई अड्डा है। यहाँ तक पहुँचने के बाद यहाँ से बस या टैक्सी से गोपेश्वर तक की यात्रा की जाती है।

रेलमार्ग- रेलगाड़ी में यात्रा के शौकीन यात्रियों के लिए यहाँ आने वाला सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश का रेलवे स्टेशन हैं यहाँ से बस या टैक्सी से गोपेश्वर तक जाते हैं और वहाँ से पैदल ही ट्रैकिंग करते हैं। 

सड़क मार्ग- उत्तराखंड के सभी शहर व कस्बे बसों द्वारा सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। अत: दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर आदि से ऋषिकेश तक की सीधी बस आसानी से उपलब्ध है और वहाँ से स्थानीय बस या टैक्सी से सीधे गोपेश्वर तक जाते हैं।

रुकने की सुविधा- 

रुद्रनाथ मंदिर के आसपास रुकने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, ट्रैकिंग करके ऊपर जाते हुए बीच-बीच में कई छोटे होटल, लॉज, कैंपस आदि की सुविधा दिखाई देती है, अत: मंदिर के पास न रुककर उसके लिए फिर से वहीं आना पड़ता है।

इसके अतिरिक्त अपना व्यक्तिगत कैंप भी विकल्प होता है। यदि अपना कैंप और खाने-पीने का सामान लेकर ट्रैक कर रहे हों तो मंदिर के आसपास कैंप लगाकर रुका जा सकता है और प्रकृति का आनंद बेहद करीब से लिया जा सकता है।

इसके अलावा सगर गाँव, मंडल गाँव और हेलंग में रहने के लिए कई सुविधाएँ उपलब्ध हैं। गोपेश्वर में बड़े होटल, हॉस्टल, लॉज, कैम्पस तथा सरकारी विश्राम गृह आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा करने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 

यथा वहाँ का मौसम वर्ष भर ठंडा रहता है, इसलिए गर्म कपड़े हमेशा साथ में लेकर चलना चाहिए। मंदिर तक ट्रैकिंग करके ही पहुँचा जाता है, इसलिए ट्रैकिंग के जूते और छड़ी हमेशा साथ रखें। इस क्षेत्र में मोबाइल सिग्नल बहुत कम मिलते हैं, अत: इसके लिए पहले से ही मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए ताकि बाद में परेशानी महसूस न हो। होटल आदि की बुकिंग पहले से करवा लेना ही सुविधाजनक होता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मंदिर के अंदर फोटोग्राफी निषिद्ध है। सर्दियों में बर्फबारी से रास्ते बंद हो जाने के कारण मंदिर के कपाट नवंबर से अप्रैल माह तक बंद रहते हैं। बरसात में मंदिर खुला तो रहता है लेकिन इस मौसम में यहाँ आने से बचना ही उचित होता है। 

यात्रा के दौरान असुविधाओं से बचने के लिए वहाँ के नियमों की जानकारी पहले से प्राप्त कर लेने से यात्रा सरल और आनंदमय हो जाती है। यथा रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा करते हुए कोई एंट्री फीस तो नहीं लगती लेकिन यह बात जानना आवश्यक है कि यह क्षेत्र केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य के अन्तर्गत आता है, इसलिए यहाँ पर प्रकृति और वन्यजीवों का ध्यान रखते हुए प्लास्टिक की चीजें वर्जित हैं। यदि कोई प्लास्टिक की चीज लेकर जा रहा है तो उससे 100 रुपए चार्ज किए जाते हैं। इसके लिए वन विभाग के द्वारा प्लास्टिक की चीजों की संख्या नोट करके एक पर्ची दी जाती है और वापसी में यही पर्ची दिखाकर जमा किए हुए 100 रुपए वापस मिल जाते हैं लेकिन अगर प्लास्टिक की चीजों की संख्या पर्ची में लिखी संख्या से कम हुई तो उसके लिए भारी जुर्माना भरना पड़ता है। 

रुद्रनाथ मंदिर की यात्रा धार्मिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद लेने वाले सैलानियों के लिए भी अतीव आनंददायक होता है।