वर्तमान राजनीति का उद्देश्य है मुद्दों को जीवित रखना

जनादेश/डेस्क: देश में सरकार कोई भी रही हो परंतु बेरोज़गारी की समस्या का निदान नहीं हो पाया, और हो भी कैसे! जिस देश में प्रतिदिन लगभग 68500 बच्चे जन्म लेते हैं, जो पूरे विश्व के जन्म दर का पाँचवा हिस्सा है, वहाँ सरकार कितना भी प्रयास करे, बढ़ती जनसंख्या की इस गति के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं करवाया जा सकता। कोई भी देश सम्पन्न तभी हो सकता है जब उस देश के नागरिक सम्पन्न होंगे और किसी भी देश के नागरिक भी तभी सम्पन्न होंगे जब वह देश सम्पन्न होगा। देश और देश के नागरिकों का यह विकास चक्र इसी प्रकार चलता है, आवश्यकता है इसे समझने और स्वीकारने की। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तो हैं किन्तु उत्तरदायित्वों का भान भी नहीं है तो अराजकता का विकास होता है, देश का एकतरफा विकास संभव नहीं। हमारे देश की अधिकांश जनसंख्या इसी गलतफहमी का शिकार है कि सरकार से सुविधाएँ पाना उसका अधिकार है लेकिन इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ कि देश के प्रति उसका कोई उत्तरदायित्व भी है।
अभी हाल ही में घोषित अग्निपथ योजना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। सरकार की तरफ से घोषित इस योजना के अन्तर्गत चार वर्षों के उपरांत सिर्फ पच्चीस प्रतिशत अग्निवीरों को परमानेंट किया जाता बाकी को लगभग पौने बारह लाख रुपए की राशि एकमुश्त देकर उन्हें सेवामुक्त कर दिया जाएगा इस बात से देश के तथाकथित युवाओं को समस्या हो गई जबकि यदि सरकार उन्हें आजीवन पेंशन देने की बात कहती तो शायद कोई समस्या नहीं होती। उन्हें तब यह फ़िक्र नहीं होती कि हम आजीवन खाली बैठकर क्या करेंगे? यहाँ समस्या मानव संसाधन का उपयोग न हो पाना नहीं है बल्कि समस्या है बिना कुछ किए अधिकाधिक सरकारी सहूलियतों का उपभोग न कर पाना है।

देश में निम्नस्तर की राजनीति इस बढ़ती जनसंख्या और बेरोज़गारी का बहुत बड़ा कारण है। वर्तमान समय में राजनीति का ध्येय सिर्फ सत्ता की शक्ति है, देश का विकास और नागरिकों की समस्या तो वर्तमान राजनीति के मुद्दों में कहीं दिखाई ही नहीं देता। विचारणीय विषय है कि जनता को मुफ्तखोरी की ओर धकेलना विकास का कौन सा पहलू हो सकता है? मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त राशन और मुफ्त इलाज साथ ही सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके मुफ्त झुग्गी अगर मिल रहे हों तो कोई क्यों जाएगा दिन भर कमरतोड़ मेहनत करके दो जून की रोटी कमाने! इन्हें तो गरीबी रेखा से नीचे का कार्ड देकर इनके भरण-पोषण की व्यवस्था कर दिया जाता है क्योंकि जहाँ बिना सोचे-समझे सिर्फ मुफ्त की योजनाओं का लोभ देकर वोट लेने वाले राजनेता हैं वहीं मुफ्त की सहूलियतों के लोभ में आँख बंद करके अपना वोट बेचने वाले वोटर का एक बड़ा हिस्सा है। इतना ही नहीं वोट पाने की तिकड़मों में और भी न जाने कितने तिकड़म ऐसे होते हैं जो देश के लिए घातक सिद्ध होते हैं यथा घुसपैठियों को वोटों के लालच में सरकारी जमीन पर बसा दिया जाता है, सरकारी पैसों से राशन सुविधाएं और नकद मुहैया करवाया जाता है और कुछ सालों के बाद वही अवैध तरीके से रहने वाले घुसपैठिये सरकारी सहायता से झुग्गी पुनर्वास के तहत मकान हासिल कर लेते हैं जबकि एक मध्यमवर्गीय परिवार सालों से जूते घिसता रहता है सरकार को टैक्स भरता है लेकिन सरकारी सहायता के नाम पर उसे शून्य से अधिक कुछ नहीं मिलता उसके टैक्स का पैसा जाता इन तथाकथित गरीबों को बसाने और उनके परिवार के भरण-पोषण में।
जबकि हमारे देश के स्थायी नागरिक भूखे सोने पर विवश हों, सिर पर छत न होने से सर्द रातों में ठंड से मर जाते हैं, लेकिन उनके लिए वही व्यवस्था नहीं हो पाती जो घुसपैठियों के लिए होती है।
ऐसी स्थिति में यदि कोई स्वयं को अनदेखा और ठगा हुआ महसूस करता है तो वह है मध्यम वर्ग। यह वर्ग हर वस्तु पर टैक्स देता है, और स्वयं को ग़रीबी रेखा से नीचे दिखाने के लिए नकली राशन कार्ड नहीं बनवाता, यह तबका अपने बच्चों की उचित शिक्षा के लिए उन्हें पब्लिक स्कूल से नीचे किसी स्कूल में भेजता नहीं, इसलिए वह सरकार की ऐसी मुफ्त वितरण की योजनाओं से वंचित रह जाता है जबकि राजस्व में इस मध्यमवर्ग का बहुत बड़ा योगदान होता है।
किन्तु राजनीति की बिसात पर बिछे इन प्यादों से राजनेताओं को क्या!! ये तो उनके लिए उच्च कुर्सी तक पहुँचाने का माध्यम मात्र होते हैं।
वर्तमान समय में बेरोज़गारी शब्द सिर्फ एक जुमला मात्र बनकर रह गया है, जो कभी-कभार राजनेताओं द्वारा इसलिए प्रयोग कर लिया जाता है ताकि जनता को ये न महसूस हो कि राजनीतिक पार्टियों को उनकी समस्या का भान नहीं है जबकि सत्य तो यही है कि ये पार्टियाँ इस समस्या का हल चाहती ही नहीं हैं। क्योंकि मुद्दे को मुद्दा बनाए रखने में ही इन्हें अपना लाभ दिखाई देता है, इसलिए किसी मुद्दे का हल होना अर्थात् एक सवाल का कम होना। आजकल राजनीतिक पार्टियाँ एक समस्या हल करके दूसरी समस्या को खोजने में अपनी ऊर्जा नहीं लगाना चाहतीं बल्कि पुरानी समस्या को हमेशा समस्या बनाए रखने में अपना लाभ देखती हैं। संक्षेप में यदि कहा जाए तो वर्तमान समय में राजनीति का उद्देश्य देश और नागरिकों का विकास नहीं बल्कि पुराने मुद्दों को जीवित रखकर उनकी सीढ़ी बनाकर सिर्फ सत्ता हासिल करना है।