नोटा ने कई सीटों के नतीजों पर डाला असर

जनादेश/नई दिल्ली: यूपी में मतदाताओं द्वारा ‘इनमें से कोई नहीं’ यानी नोटा का विकल्प चुनना कई सीटों के परिणाम पर बड़ा असर डालने वाला साबित हुआ। कम अंतर से जीती गई सीटों पर यह असर सबसे दिखा। पढ़िए ऐसी ही कुछ सीटों के बारे में जहां मतदाताओं ने अगर नोटा न चुना होता तो शायद प्रत्याशियों के चुनाव परिणाम ही बदल सकते थे।

बड़ौत (बागपत) : भाजपा के कृष्णपाल मलिक ने रालोद के जयवीर को 315 वोटों से हराया। यहां नोटा पर 579 वोट डले। कांग्रेस के राहुल कुमार को 1,849 और आप के सुधीर को 709 वोट मिले।

चांदपुर (बिजनौर) : सपा के स्वामी ओमवेश ने भाजपा के कमलेश सैनी को 234 वोट से हराया। नोटा पर 854 वोट पड़े। एआईएमआई ने 1,586 वोट पाए तो आआपा ने 364।
छिबरामऊ (कन्नौज) : भाजपा की अर्चना पांडेय सपा के अरविंद सिंह यादव से महज 1,111 वोट ज्यादा लेकर जीतीं। यहां भी नोटा में 1775 वोट पड़े।
कटरा (शाहजहांपुर) : भाजपा के वीर विक्रम सिंह ने 357 वोट से सपा के राजेश यादव को हराया। नोटा में 1091 वोट पड़े।
नकुड़ (सहारनपुर) : भाजपा के मुकेश चौधरी 315 वोट से जीते। समाजवादी पार्टी के धर्म सिंह सैनी हारे। नोटा में 710 वोट। एआईएमआईएम ने 3593 वोट पाए।
नहटौर (बिजनौर) : भाजपा के ओम कुमार 258 वोट से जीते। रालोद के मुंशीराम को हराया। 1057 ने नोटा को चुना।
रामनगर (बाराबंकी) : सपा के फरीद महफूज ने भाजपा के शरद अवस्थी को 261 वोट से हराया। यहां नोटा में 1,822 वोट पड़े हैं।

गैरभाजपा, गैरकांग्रेसी सियासत को झटका
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों में गैरभाजपा, गैरकांग्रेस राजनीति की भविष्य की संभावना भी छुपी थी। मगर पंजाब को छोड़कर अन्य राज्यों के नतीजे इन संभावनाओं को अपेक्षा के अनुरूप मजबूती नहीं दे पाए।

हां, कांग्रेस के बेहद कमजोर प्रदर्शन ने भविष्य में गैरकांग्रेस, गैरभाजपा दलों की एकजुटता मुहिम तेज होने का अवसर जरूर मुहैया कराया है। दरअसल गैरभाजपा, गैरकांग्रेस राजनीति के मजबूत होने के लिए जरूरी था कि पंजाब की तरह ही कम से कम उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो। इसके अलावा गैरभाजपा, गैरकांग्रेस दल गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में किंगमेकर की भूमिका में आएं। इस मुहिम की अगुआ तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसके लिए पूरी ताकत भी लगाई। तृणमूल कांग्रेस जहां गोवा और मणिपुर में पूरे जोश से चुनाव मैदान में उतरी वहीं आम आदमी पार्टी ने पंजाब के अलावा गोवा और उत्तराखंड में पूरी ताकत झोंकी। इस राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए ममता बनर्जी ने उत्तर प्रदेश में सपा के समर्थन में दो बार बड़े स्तर पर मोर्चा खोला। हालांकि पंजाब में अहम बदलाव के अलावा इस मुहिम को ताकत देने वाले नतीजे किसी दूसरे राज्य से नहीं आए। भाजपा चारों राज्यों में अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही।

कांग्रेस ने मजबूत भविष्य की नींव रखी
गैरभाजपा, गैरकांग्रेस दलों को पंजाब को छोड़कर भले ही कहीं अहम सफलता हाथ न लगी हो लेकिन कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन ने इस राजनीति के मजबूत भविष्य की नींव रख दी है। कांग्रेस ने न सिर्फ पंजाब में सत्ता गंवाई, बल्कि उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत होने का लाभ भी नहीं उठा पाई। इसके कारण अब कांग्रेस पर क्षेत्रीय दलों का आधिपत्य स्वीकार करने या यूपीए का पुनर्गठन करने का दबाव बढ़ेगा।

गैरकांग्रेस विपक्ष क्यों है ऊहापोह में
कांग्रेस बीते आठ साल में एक बार भी भाजपा को चुनौती देती नहीं दिखी। गैरकांग्रेस दलों की मुश्किल यह है कि कांग्रेस के मजबूत हुए बिना भाजपा को केंद्र की सत्ता से हिलाना असंभव है। चूंकि कांग्रेस खुद लंबे समय से अंतर्विरोधों में डूबी है, ऐसे में गैरकांग्रेस, गैरभाजपा विपक्ष ऊहापोह में है। ये दल चाहते हैं कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व स्वीकार कर भाजपा के खिलाफ लड़ाई में उसका साथ दे। इस क्रम में ममता बनर्जी ने हाल ही में संघवाद के नाम पर गैरकांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम छेड़ी है। इस मुहिम में फिलहाल आप, सपा, राजद, टीआरएस, डीएमके का तृणमूल कांग्रेस को साथ मिला है।