लॉकडाउन- आर्थिक रूप से मध्यम व कमजोर वर्ग पर प्रभाव?

नई दिल्लीः  हाल फिलहाल देश के आर्थिक रुप से मध्यम व कमजोर वर्ग जो देश में कुल जनसंख्या साठ प्रतिशत से अधिक है, दिसम्बर 2019 से भारत में फैले नोवेल कोरोना वायरस की महामारी कोविद 19 के कारण प्रभावित हो रहे हैं। यही लोग ही लॉकडाउन अवधि में कर्मयोद्धा भी साबित हो रहे हैं। अधिकांश लोग घरों में बैठ कर भरपूर सहयोग दे रहे है। कुछ तथाकथित नासमझ लोग ही लॉकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं।
कम संसाधन होते हुए भी छोटे छोटे मकानों में रह कर वे बिना किसी आपत्ति व शिकायत के शांतिपूर्ण ढंग से रह रहे हैं. चिकित्सक, नर्स, चिकित्सीय कर्मवारी, सफाईकर्मी, सुरक्षाकर्मी इत्यादि तो प्रत्यक्ष रुप से कर्मयोद्धा है ही परन्तु निम्न व मध्यम आय वर्ग के लोग अप्रत्यक्ष रुप से यदि अपना सहयोग नहीं देते तो नोवल कोरोना वायरस से इस युद्ध में निपटना भारी पड़ता. केन्द्र व राज्य सरकारों के निर्माण में इन्हीं वर्ग विशेष के लोगों का बड़ा हाथ होता है जबकि बनने वाली सरकार से इनको प्रत्यक्ष रुप से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता।
प्रत्यक्ष में सभी आर्थिक व सामाजिक सहायता गरीब लोगों को मिल जाती है, ये लोग गरीब व मध्यम के बीच मध्य पंक्ति में ही रह जाते है पर ये लोग सरकारी सहायता लेने में भी संकोच का अनुभव करते हैं. इस वर्ग की राजनीतिक उपयोगिता बहुत होती है जिस बात को राजनेता समझते है परन्तु वक्त पड़ने पर इनको भुला दिया जाता है।

इस आय वर्ग में छोटे दुकानदार, किसान, मजदूर, छोटे छोटे कुटीर उद्योग चलाने वाले, इत्यादि बड़ी संख्या में होते हैं जिनसे ही राजनीतिक दल विभिन्न आंदोलन, प्रदर्शन, अथवा कोई भी अभियान चलाने का प्रयास करते है।
लॉकडाउन में सड़कें सुनसान हो गयी है. लोगों को घरों में रोक दिया गया है, अतः इस वर्ग की सभी गतिविधियां भी रुक गई है, जिनसे इनकी आमदनी भी रुक जाती है. सरकार तथा कुछ सामाजिक संस्थाऐं इनको थोडी बहुत सहायता पहंुचाती हैं तथा खाने पीने की समस्या का निवारण करती है. कोरोना वायरस से स्थिति गम्भीर होने पर मुम्बई, दिल्ली इत्यादि में बड़ी संख्या में यही लोग सड़कों पर आ कर अपने अपने गांवों की ओर बिना किसी यातायात साधन के दौड़ते भागते व चलते नजर आये है.
वे लोग छोटे छोटे बच्चों व महिलाओं के साथ अपने गांव अपनों के बीच पहुंचने की जल्दी में दिखाई दिये. बस एक ही कामना उनका हौसला बढ़ा रही थी कि वे अपने गांव में अपनों के बीच किसी न किसी प्रकार पहुंच जायें. उत्तरप्रदेश व बिहार से ऐसे प्रवासी लोगों की संख्या ज्यादा होती है हालांकि उत्तरप्रदेश सरकार इनकी मुसीबतों को समझ कर समय रहते उनकी यातायात की व्यवस्था कर रही है.
उत्तरप्रदेश सरकार ने 21 लाख लोगों के खातों में 1000/- रुपये प्रतिमाह की राशि ड़ीबीटी के माध्यम से भिजवायी तथा 15 लाख श्रमिकों का डेटाबैंक तैयार करके उनके खातों में भी 1000/- रुपये प्रतिमाह आरटीजीएस के माध्यम से हस्तांतरित की गई.
1.65 करोड़ लोगों को अन्त्योदय योजना, मनरेगा, दिहाड़ी मजदूर तथा निर्माण मजदूरों को भी एक महीने के राशन की व्यवस्था की गई. असहाय परिवारों के भरण पोषण के लिए 1000/- रुपये प्रतिमाह ड़लवाये गये. 1.5 करोड़ किसानों को भी 2000/- रुपये प्रतिमाह किसान सम्मान निधि के तौर पर हस्तांतरित की गई. पैंशन की राशि भी सरकार ने बैंक में डलवायी है . जब युद्ध होता है तो सरकार व जनता दोनों ही एक दूसरे का साथ देते हैं। तभी युद्ध में विजय प्राप्त होती है।

भिन्न राज्यों से आने व जाने वाले सभी जिलों में जिला रोजगार कार्यालयों में इस प्रकार के मजदूर, ठेले वाले, व छोटे छोटे कामगारों का पंजीकरण होना चाहिए व एक नम्बर जैसे आधार कार्ड नम्बर होता है वैसा ही निर्गमित किया जाना चाहिए जिससे कभी भी फर्जी गरीब व मजदूर उत्पन्न न हों तथा जरुरतमंदों को सहायता समय पर पहुंच सके. प्रत्येक राज्य सरकार को यह भी पता रहे कि उनके राज्य के कितने मजदूर अन्य राज्य में काम कर रहे है.
घरों के बाहर सफाईकर्मी, गैस सिलेंड़र के वैंडर, फल सब्जी घरों तक पहुंचाने वाले आदि का पूरा पूरा ध्यान रखा जाना अनिवार्य है. सरकार व समस्त समाज को इन्हीं लोगों का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए. कमजोर व मध्यम आय वर्ग को ध्यान में रख कर डेटा बैंक तैयार करके उनकी सहायता की जानी चाहिए. कोरोना वायरस की भयावह स्थिति से निपटने के बाद भी अभी आगामी कई महीनों तक समाज की देखभाल करने व उसको अनुशासन में रखने की आवश्यकता पड़ेगी। इनका अनुशासन व संयम बहुत काम आयेगा, तभी देश विपदा से निकल कर विकास के मार्ग पर अग्रसर हो पायेगा. यदि ऐसा बड़ा वर्ग यदि सही दिशा में विकास की ओर चल पड़ा तो देश को भी विकास के मार्ग पर अग्रसर होते देर नहीं लगेगी.