मानसिक बीमारियों से भारतीय चिकित्सक परेशान

जनादेश/नई दिल्ली: मौजूदा सामाजिक परिवेश स्वास्थ्य के लिहाज से कई मायनों में चुनौतियां खड़ी कर रहा है। विशेषकर कोरोना महामारी के बाद से शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह की सेहत पर इसका प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है। कोरोना के कई वैरिएंट्स ने जहां लोगों के लिए गंभीर जटिलताएं पैदा कीं, वहीं समाज में बनी असामान्य स्थितियों का मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर देखने को मिला। अस्पतालों में इलाज के लिए लगी लंबी लाइनों और भागादौड़ी के बीच क्या आपके दिमाग में कभी यह ख्याल आता है कि जो डॉक्टर्स, आपका इलाज कर रहे हैं वे कितने स्वस्थ हैं? यह सवाल इसलिए आवश्यक है क्योंकि सामान्यतौर पर हमें अपनी परेशानी के आगे कुछ दिखाई नहीं देता है और इसी के साथ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अगर डॉक्टर्स ही स्वस्थ नहीं हैं तो वह हमारा इलाज किन परिस्थितियों में कर रहे हैं।

आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है, सेहत के प्रति लोगों को जागरूक करने का खास दिन। पर इस बार हम उनके स्वास्थ्य की बात करेंगे जिनके पास हम खुद को स्वस्थ रखने की अतिउम्मीद लेकर पहुंचते हैं- हमारे डॉक्टर्स। डॉक्टर्स कितने स्वस्थ हैं? यह सुनने में अटपटा सा जरूर लग रहा होगा, पर मौजूदा हकीकत इस सवाल को ‘आवश्यक सवाल’ के तौर पर पूछने को विवश करती है। सदियों से चली आ रही एक रूढ़िवादी सोच- ‘डॉक्टर्स भगवान होते हैं’ ने संभवत: अनायास भी हमारे दिमाग में इस सवाल को आने ही नहीं दिया, क्योंकि भगवान तो कभी अस्वस्थ हो ही नहीं सकते। पर आंकड़े निश्चित ही इससे उलट और परेशान करने वाले हैं, जो इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि हमें डॉक्टर्स को पहले इंसान और फिर ‘धरती का भगवान’ मानना होगा।

राजस्थान की दुखद घटना
राजस्थान के दौसा में डॉ अर्चना की आत्महत्या का मामला पिछले दिनों सुर्खियों में रहा। मरीज के परिजनों द्वारा धमकी और प्रताड़ना से तंग आकर डॉक्टर अर्चना ने आत्महत्या कर ली। यह कोई पहला मामला नहीं है, ऐसे न जाने कितने डॉक्टर्स रसूखदार मरीजों के परिजनों के दबाव और कई प्रकार के तनाव को सहन करते रहते हैं। कुछ इस बढ़ते दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते, अंजाम डॉ अर्चना के रूप में आपके सामने है। इस पूरी घटना का निचोड़ देखें तो यह समझ आता है कि हम डॉक्टर्स को भगवान ही तो मानते आ रहे हैं। सुनने में तो यह निश्चित ही डॉक्टरों के प्रति सम्मान जैसा ध्वनि करता है पर क्या यह भावनात्मक हानि का कारण नहीं बन रहा? जिसमें हम उनके मानवीय पक्ष को समझना ही नहीं चाहते।

आंकड़े हैरान करने वाले
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का हाल ही में किया गया एक सर्वे हैरान कर देने वाला है। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि हमलों और आपराधिक मुकदमे का डर, नींद की कमी तनाव, सामाजिक परिवेश, रूढ़िवादिता के चलते देश में डॉक्टरों का एक बड़ा तबका मानसिक रोगों का शिकार है। आईएमए का सर्वे कहता है कि देश में 82.7% डॉक्टर अपने पेशे में तनाव महसूस करते हैं। अलग-अलग विभाग से जुड़े देशभर के 1,681 डॉक्टरों पर किए गए इस सर्वेक्षण में शामिल 46.3% डॉक्टरों ने हिंसा के डर को तनाव का मुख्य कारण बताया, वहीं 13.7 फीसदी ने बताया कि उनपर आपराधिक मुकदमा चलाने की आशंका थी। अपने मरीजों को हर रात 6-8 घंटे की नींद पूरी करने की सलाह देने वाले डॉक्टर्स खुद कई कारणों से नींद पूरी नहीं कर पा रहे हैं। काम के दबाव के चलते स्वस्थ आहार तो दूर कइयों को तो दिन का भोजन भी सही से नहीं मिल पाता।

हम भी तो इंसान ही हैं, पर हमारा दर्द मौन है
बीएसएफ काउंसलर और मनोचिकित्सक डॉ विधि एम. पिलानिया कहती हैं, कई-कई दिन ऐसे बीत जाते थे जब सुबह से चल रही ओपीडी दोपहर 3-4 बजे खत्म होती है। सभी मरीजों को हम पौष्टिक आहार लेने की सलाह दे रहे होते हैं, और ओपीडी के बाद थोड़े से बचे समय में भूख मिटाने के लिए हम समोसे खाने को मजबूर होते हैं। काम के साथ-साथ पढ़ाई, परिवार की चिंता। ऊपर से रसूखदार लोगों के इलाज को लेकर बनाया जा रहा अलग से दबाव, इतनी आसान नहीं है डॉक्टर्स की जिंदगी। डॉ अर्चना का मामला दुखद है, पर इस तरह के कई डॉक्टर्स के अंदर अजीबो-पशोपेश  निरंतर चलता रहता है। लोगों की एक अलग लेवल की उम्मीद, जिसमें वो ‘न’ सुनना ही नहीं चाहते। यह तनाव ज्यादातर चिकित्सक झेल रहे हैं।

ऊपर से हमारे देश में डॉक्टर्स की कमी के कारण रोजाना एक-एक डॉक्टर को 100 से अधिक मरीज देखने होते हैं, जो सौ अलग-अलग तरीके के होते हैं। इन परिस्थितयां का बाहरी आवरण तो बहुत सुखद दिखता है, पर अंदर उसका बिल्कुल उल्टा है। सोचिए अगर डॉक्टर खुद तनाव में रहेगा तो वह आपका इलाज कैसे करेगा? इसलिए स्टीरियोटाइप से निकलकर हकीकत में जीना होगा। डॉक्टर्स भी यह समझें कि उनके हाथ में एक सीमा तक का ही सामर्थ्य है, कोई जादू की छड़ी नहीं। मरीज और उनके परिजन भी इसे समझें तो बेहतर होगा,  जिस दिन इस नासमझी की यह खाई भर गई, निश्चित तौर पर इलाज की गुणवत्ता और मरीजों की संतुष्टि अपने आप बढ़ जाएगी।

डॉक्टर स्वस्थ होंगे, तभी समाज स्वस्थ हो सकेगा
आईएमए का सर्वे मौजूदा सामाजिक स्थिति पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि तनावपूर्ण स्थिति में आपकी उत्पादकता कम हो जाती है, ऐसे में डॉक्टर्स के लिए तनाव और अवसाद जैसी स्थिति पैदा कर, स्वस्थ समाज की कल्पना करना बेमानी ही होगी। चिकित्सक और मरीज दोनों को इस बात को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है, दोनों को रूढ़िवादी काल्पनिक मायाजाल से निकलने की जरूरत है।