संकटग्रस्त श्रीलंका की मदद करते हुए भारत ने निभाई जिम्मेदार पड़ोसी की भूमिका

जनादेश/नई दिल्ली: श्रीलंका इस समय अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है। यह आर्थिक रूप से विकट हो गया है। जनता में जबरदस्त आक्रोश है। इससे राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। राष्ट्रपति गोटाबाया महीनों तक जनता के असंतोष की अनदेखी करते हुए कठोर, निर्णायक निर्णय लेने के लिए अनिच्छुक थे, लेकिन लगातार जनता के दबाव ने उन्हें अपने खोल से बाहर कर दिया। हालांकि उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा नहीं दिया, लेकिन रानिल विक्रमसिंघे के रूप में एक नया प्रधान मंत्री नियुक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने युवा मंत्रिपरिषद के गठन के साथ ही अपनी शक्तियों के नियंत्रण से संबंधित संवैधानिक सुधारों को लागू करने की भी प्रतिबद्धता जताई है।

पिछले दिनों उनके बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के समर्थकों और सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी। प्रदर्शनकारियों ने महिंद्रा के घर में आग लगा दी। दबाव में, महिंदा राजपक्षे को न केवल प्रधान मंत्री के रूप में इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि वर्तमान में एक नौसैनिक शिविर में छिपा हुआ है।

स्वतंत्र श्रीलंका के इतिहास में यह सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि संकट की इस घड़ी में उनका साथ देने वाला कोई नहीं है। राजपक्षे परिवार ने एक ऐसी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है जो कुछ साल पहले तक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण अच्छी तरह से काम कर रही थी। महिंदा, उनके बेटे नमल के साथ उनके भाइयों तुलसी और चमल को भी उनके पदों से हटा दिया गया था। इसके बावजूद राजपक्षे परिवार से ठगा हुआ महसूस कर रहे श्रीलंका की सड़कों पर जमा हुए प्रदर्शनकारियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। गोटबाया का राजनीतिक भविष्य भी अधर में लगता है और अब तक इस संकट पर उसकी प्रतिक्रिया भी धीमी रही है। हालाँकि इस आर्थिक संकट के बीज पिछली श्रीलंकाई सरकारों के दौरान बोए गए थे, इसी अवधि में श्रीलंका ने भी कृषि में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने जैसे बुरे निर्णय लिए। जब इस निर्णय को उलट दिया गया, तो पहले ही गंभीर क्षति हो चुकी थी।

श्रीलंका के मामले में भारत का कूटनीतिक रवैया अभी तक सही रहा है। जहां भारत ने जमीनी हकीकत को भांपकर 2019 में राजपक्षे के सत्ता में आते ही उनके साथ संपर्क साधा वहीं हाल के आर्थिक संकट में श्रीलंका को निरंतर मदद भी पहुंचाई।

भारत इसमें एक जिम्मेदार पड़ोसी की तरह मददगार बना रहेगा, लेकिन श्रीलंका के भविष्य की कुंजी उसके नेताओं के हाथ में है कि वे किस प्रकार अपनी जिम्मेदारी निभाकर जन आकांक्षाओं की पूर्ति करेंगे।