अन्य राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ ज्यादा , जानिए क्यों

जनादेश/डेस्क: उत्तराखंड राज्य में मानसून सीजन में बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाएं हिमालयी राज्यों में सबसे ज्यादा दर्ज की गई है। इन घटनाओं से जानमाल की हानि भी काफी हद तक होती हैं।बादल फटने और अतिवृष्टि की वजह जहां एक तरफ पर्यावरणीय कारण है तो दूसरी तरफ अंधाधुन विकास भी है।

दरअसल उत्तराखंड में कई जगह पर बादल फटने और अतिवृष्टि बारिश होने की वजह से आपदाएं आ रही है । इन सब की वजह मौसम का बदलना और बारिश के पैटर्न में हो रहे बदलाव को बताया जा रहा हैं। उत्तराखंड में लगभग ऐसी 60 से ज्यादा घटनाएं हैं जो कि 20 जुलाई 1970 से लेकर 2022 तक हुई है।

उत्तराखंड के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह के मुताबिक जम्मू कश्मीर, हिमाचल या फिर दूसरे अन्य हिमालय राज्यों में मानसून सीजन में सबसे ज्यादा बारिश होती है  जिसके तहत बादल फटने  या फिर अतिवृष्टि होने की घटनाएं होती है। 

उत्तराखंड में मानसून सीजन जून से सितम्बर तक रहता हैं। और इसी दौरान ये घटनाएं होती हैं। गौर किया जाए तो साल 2021 में कुल 26 बादल फटने /अतिवृष्टि की घटना हुई। जिसमें 11 लोगों की जान गई। 50 जानवर भी मरे। वहीं  साल 2020 में कुल 14 बादल फटने/अतिवृष्टि की घटनाएं हुई, जिसमें 19 लोगों की मौत हुई।  साल 2019 में कुल 23 बादल फटने या अतिवृष्टि की घटनाएं  रिकॉर्ड  हुई, 31 लोगो की मौत भी हुई । साल 2018 में कुल 7 बादल फटने  अतिवृष्टि की घटनाएं  रिकॉर्ड  हुई, 10 लोगों की मौत हुई।

ये हैं बादले फटने की वजह

लेकिन अब सवाल यह उठता हैं कि उत्तराखंड राज्य में पिछले कुछ सालों में  बादल फटने की घटनाएं क्यों हो रही है । जिसपरसवाडिया इंस्टीट्यूट के रिटायर्ड वैज्ञानिक डीपी डोभाल का कहना हैं कि उत्तराखंड में बड़ी और गहरी संकरी  घाटियां है। जिसकी वजह से बादल ऊपर नहीं उठ पाते हैं और निचले हिस्सों में गर्म हवा और ठंडी हवा की वजह से दबाव इतना बढ़ जाता है कि घाटियों में और ज्यादातर इलाकों में बादल फटने की घटनाएं होती है ।

दरअसल क्लाउड बर्स्ट यानी बादल फटने की घटनाओं का डाटा अभी तक ना तो उत्तराखंड के पास है और ना ही अन्य हिमालय राज्यों के पास है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके लिए डॉप्लर  रडार ज्यादा से ज्यादा लगाने होंगे जिससे डाटा पर रिर्सच किया जा सके। वहीं दूसरा कारण प्राकृतिक को बताया गया है। सबसे बड़ी वजह पेड़ों का कटान और डेवलपमेंट भी है । क्योंकि लगातार कंस्ट्रक्शन होने से पोलूशन बढ़ता है और हवा में धूल के कण ज्यादा हो जाते हैं साथ ही धरातल ज्यादा गर्म हो जाता है।