टिकैत के गढ़ में भाजपा का बुरा हाल

जनादेश/डेस्क: भगवा रंग में डूबे चुनावी नतीजों के बीच मुजफ्फरनगर जिले में किसान आंदोलन का असर खूब दिखा। तीन कृषि कानूनों को मोदी सरकार के वापस लेने के बावजूद किसानों में उपजी नाराजगी ने गठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाई। बुढ़ाना और मीरापुर सीटों पर भाजपा रणनीति में पहले दिन से पीछे नजर आई। हार-जीत के खेल में भाजपा पुरकाजी और चरथावल की सीट भी गंवा बैठी। भाकियू के तल्ख तेवरों से भी भाजपा को झटका लगा है।

कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली के बॉर्डर पर 13 महीने चले किसान आंदोलन का असर मुजफ्फरनगर और शामली के चुनाव नतीजों में साफ नजर आया है। गठबंधन के मुकाबले दोनों जिलों की नौ सीटों में से केवल दो सीट पर भाजपा जीत दोहरा पाई है। गाजीपुर बॉर्डर पर चले लंबे आंदोलन में आए उतार-चढ़ाव से पश्चिमी यूपी के किसानों में भाजपा के रवैये को लेकर नाराजगी बढ़ती गई। मुजफ्फरनगर किसान आंदोलन का केंद्र बन गया। पांच सितंबर को राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान पर किसान रैली हुई, जिसमें कई राज्यों के किसानों ने भागीदारी की। बदले माहौल को भाजपा के रणनीतिकार भांप नहीं पाए। खाप पंचायतें सक्रिय हुईं तो भाजपा की नीतियों के विरुद्ध नाराजगी बढ़ती गई।

वहीं मोर्चे पर अड़े किसानों की एकजुटता और पांच राज्यों में चुनाव के दृष्टिगत मोदी सरकार को निर्णय वापस लेना पड़ा। किसान आंदोलन के दौरान भाजपा के खिलाफ बनीं किसानों की नाराजगी चुनाव नतीजों में साफ दिख रही है। भाकियू के तल्ख तेवरों ने भी गठबंधन के प्रत्याशियों को ताकत दी, जिसकी वजह से मुजफ्फरनगर में भाजपा ने बुढ़ाना, मीरापुर, पुरकाजी और चरथावल की सीटें गंवा दी। शामली में भाजपा का खाता ही नहीं खुल पाया। कैराना, शामली और थानाभवन में भी गठबंधन ने बाजी मार ली।

चुनाव अखाड़े के बाहर खूब लड़े टिकैत बंधु
किसान आंदोलन की अगुवाई से सुर्खियों में आए भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत के तल्ख बयानों ने चुनाव रण में खूब माहौल बनाया। किसानों के मुद्दों पर उन्होंने सरकार को खूब घेरा। मतदान के दिन ‘वोट कोक्को ले गई..’ का बयान प्रदेश भर में चर्चा में रहा। भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने बागपत और शामली में हुई किसानों की सभाओं में भाजपा पर हल्ला बोला। यही नहीं रालोद के प्रत्याशियों को सिसौली में सिंबल भी दिए।