भारत  के 75 अनूठे उत्पादों को मिली अंतरराष्ट्रीय कानूनी पहचान

जनादेश/डेस्क: भारत के 75 अनूठे उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी पहचान मिल गई है। बता दें कि यह पहचान यानी जीआई टैग (जीयोग्राफिकल इंडीकेशन सार्टिफिकेट यानी भौगोलिक पंजीकरण प्रमाणपत्र) लेने से संबंधित देश का अपने उत्पाद पर संपत्ति जैसा अधिकार हो जाता है। जिसके तहत कोई अन्य देश, कंपनी या व्यक्ति समान उत्पाद तो छोड़िए मिलती-जुलती वस्तु भी नहीं बेच सकता है। उत्तराखंड के गोमुख का गंगा जल हो या फिर महाराष्ट्र की रेणुका माता मंदिर के तांबुल समेत 75 उत्पादों को अब सिर्फ भारत ही वैश्विक बाजार में बेच सकता है।

इस दौरान जीएमजीएस के संस्थापक और अध्यक्ष गणेश हिंगमिरे ने कहा कि उनकी पहल ना सिर्फ देश की आजादी के 75 साल का प्रतीक है, बल्कि देश की असाधारण और अद्भुत कला, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक विरासत को सहेजने, सुरक्षित रखने का प्रयास भी है।

एरी रेशम, गोमुख गंगाजल, दार्जिलिंग चाय, चंदेरी साड़ियां और लद्दाख की छंग, लातूर की इमली को अंतरराष्ट्रीय कानूनी पहचान दिलाने वाले हिंगमिरे ने कहा कि देश की इस संपदा पर हमारा अधिकार है। लेकिन इंटरनेट के दौर में तमाम विदेशी कंपनियां हथकंडे अपनाकर हमारी संपदा पर अपना कब्जा जमा लेती हैं। ऐसे में यह जरूरी है की अपने उत्पादों, जो वास्तविकता में सिर्फ भारत में ही होते हैं। उन पर हमारी पहचान कायम रहे।

उन्होने आगे कहा कि महाराष्ट्र के वेंगुर्ला जैसा काजू पूरी दुनिया में कहीं नहीं होता। ऐसे में जीआई टैग होना जरूरी है, नहीं तो कल को कोई अन्य उसकी विशेषता पर अपना दावा ठोंकने लगेगा। जीआई टैगिंग आदिवासी समुदायों की अनूठी संपत्ति की रक्षा करने, पिछड़े समुदायों की रचनाओं को पहचानने और भारत के कृषि उत्पादों को सहेजेगा। जीएमजीसी ने यह कदम भारतीय हल्दी के संबंध में तब बढ़ाया था, जब भारत ने 1990 के दशक के अंत में अमेरिका के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की थी।

क्या हैं जीआई टैग प्रमुख उत्पाद

गोमुख का गंगाजल- गंगा भारत की पवित्र नदी है, जिसका उद्भव गोमुख से होता है। माना जाता है कि तमाम तरह के औषधीय तत्वों को गंगाजल अपने में समेटे रहता है।

शिफंग- यह एक तहत कि बांसुरी है, जो असम के बोडोलैंड की है। खास बात ये हैं कि इसमें पांच ही छेद होते हैं, जबकि अन्य बांसुरियों छह छेद होते हैं।

खेरा दापिनी- इसका वानस्पतिक नाम प्रेमना हर्बेसिया के नाम है। यह व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली सब्जी और औषधीय पौधा है, जो असम में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर उगता है।

रानिया रोटी- कागज़ जैसी पतली और नाजुक चपटी रोटी, सदियों से महाराष्ट्र के महार समुदाय का मुख्य भोजन रहा है। क्षेत्रीय महिलाओं ने इस विशेष रोटी को तैयार करने के लिए खाद्य उद्योग में रोजगार पाया है।

खाम- आसाम के बोडोलैंड का ढोल, जो बहुत तेज बजता है। यह मृदंग जैसा होता है और शिव भगवान के आवाहन के लिए बजाया जाता है ।

पंचिनचोली इमली-महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा की इस इमली में औषधीय गुण होते हैं। सामान्य इमली से अधिक तरल पदार्थ वाली यह इमली डेढ़ फुट से ज्यादा लंबी होती है।

स्नो माउंटेन अदरक- यह कश्मीर के पहाड़ों में उगता है और व्यापक रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने के लिए उपयोग किया जाता है।

सूर- उत्तराखंड का यह पेय पदार्थ एक व्यापक संग्रह है। इसमें मादकता होती है और यह स्थानीय फलों, पत्तियों-जड़ों का काढ़ा जैसा होता है।

सर्जा- बोडो जनजातियों द्वारा बजाया जाने वाला सदियों पुराना संगीत वाद्ययंत्र, सेरजा मधुर संगीत बनाने के लिए जाना जाता है।

एरी रेशम- पूर्वोत्तर में असम और आदिवासी समुदायों के सांस्कृतिक ताने-बाने का एक अभिन्न अंग, एरी रेशम नरम लेकिन टिकाऊ है। इसे अहिंसक रेशम के रूप में जाना जाता है क्योंकि रेशम में बदलने के लिए कोकून को उबालने से पहले कीड़ों को बाहर निकलने दिया जाता है।

रेणुका माता तांबुल- रेणुका माता मंदिर महाराष्ट्र के महुरगढ़ में एक डरावना मंदिर है। तांबुल पान के पत्तों, मसालों और गुलाब की पंखुड़ियों की पारंपरिक रेसिपी के साथ आता है। मंदिर के पीठासीन देवता को शंखनाद चढ़ाया जाता है और भक्तों को भी वितरित किया जाता है।

तुलजापुर कवड़ी ची माल- मराठा राजा शिवाजी महाराज और उनके बेटे को कौड़ियों से जड़े हार को पहनने के लिए जाना जाता था। वह महाराष्ट्र के तुलजापुर देवी के आशीर्वाद के तौर पर इसे पहनते थे।