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बढ़ते एनकाउंटर, क्या टूट रहा है अदालती भरोसा!

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जनादेश/नई दिल्लीः  जब से कुख्यात विकास दुबे ने अपने साथियों  के साथ मिलकर आठ पुलिस कर्मियों की हत्या की है तब से एक सप्ताह के अंदर कुख्यात विकास दुबे समेत उक्त सामूहिक पुलिस हत्याकांड के 6 आरोपियों को अलग अलग मुठभेड़ दिखाकर पुलिस द्वारा मार डाला गया. सभी मुठभेड़ों में लगभग एक जैसी ही कहानी दर्शाई गई है कि आरोपी ने पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश की और इस दौरान हुई मुठभेड़ में आरोपी मारा गया.
पुलिस की यही कहानी वर्षों से चली आ रही है. क्या अपराधी को सजा देने का यह शार्ट कट नहीं है? क्या पुलिस का अपराधियों को अदालताें से सजा दिलाने का भरोसा टूट गया है जो बिना चार्जशीट, बिना गवाही, बिना सबूत और बिना कानूनी बहस के ही सीधे पुलिस स्वयं ही सजा देने लगी है. यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्रा और कानून व्यवस्था की दृृष्टि से शुभ संकेत नहीं हैं। जहां तक विकास दुबे का सवाल है तो जब उसने एक दिन पहले उज्जैन में नाटकीय ढंग से आत्म समर्पण किया तो दुर्दांत अपराधी होने के नाते कानपुर लाने के दौरान उसे हथकड़ी क्याें नहीं लगाई गई. पुलिस शांति भंग की आशंका जैसे मामूली मामलों में आरोपी को हथकड़ी लगाकर लाती है तो विकास दुबे को खुला कैसे छोड़ दिया गया.
वहीं मुठभेड़ से पहले साथ चल रहे मीडिया कर्मियों का रोका जाना मुठभेड़ को संदिग्ध बनाता है. पुलिस कुछ भी दावा करे लेकिन सच यही है कि विकास दुबे कही सबकी कलई न खोल दें. इसी डर से यह स्वांग पुलिस द्वारा रचा गया जिसकी सीबीआई या फिर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश से निष्पक्ष जांच होनी  ही चाहिए.इस साल के 6 महीनों में ही 117 एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा किए गए हैं. स्वयं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी का कहना है कि 1200 एनकाउंटर में 40 खतरनाक अपराधी मारे गए हैं।
दूसरी तरफ एनकाउंटर को लेकर विपक्ष भी सत्तारुढ़ बीजेपी पर हावी है. समाजवादी पार्टी का कहना है कि योगी सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है और अपनी कमियों को छिपाने के लिए एनकाउंटर का सहारा ले रही है.पूर्व मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव ने कहा कि पुलिस की गाड़ी न पलटती तो सरकार पलट जाती.
सपा नेता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि एनकाउंटर में  हत्या हो रही है और साथ ही बदले की भावना से काम हो रहा है।
वह कहते हैं, ‘चिन्हित करके लोगों को मारा जा रहा है और उन्हें दंडित किया जा रहा है. इसलिए सीबीआई जांच होनी चाहिए.
वहीं सरकारी सूची के अनुसार मुख्यमंत्राी योगी आदित्यनाथ के शासनकाल यानी मार्च 2017 से जुलाई 2018 के मध्य तक पुलिस ने 3026 मुठभेड़ें कीं जिनमें 78 अपराधियों को मार गिराया गया जबकि 838 अपराधी घायल हुए. इस दौरान 11981 लोगों ने अपनी जमानत रद्द कराई और अदालत में आत्मसमर्पण किया.
वहीं कुछ चर्चित एनकाउंटर भी हैं जो भुलाये नहीं भूलते, उनमें मुख्य रूप से हैदराबाद एनकाउंटर कांड है जिसके तहत गत वर्ष छह दिसंबर को हैदराबाद में वेटरनरी डाक्टर के गैंगरेप और मर्डर के चारों आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया. यह घटना मौका-ए-वारदात पर क्राइम सीन दोहराने के क्रम में हुई. पुलिस के मुताबिक चारों आरोपियों ने मौके से भागने की कोशिश की थी जिसके बाद उन्हें ढेर कर दिया गया।
इसी तरह सन 2004 में हुए एनकाउंटर में गुजरात पुलिस ने इशरत जहां और उसके दोस्त प्रनेश पिल्लई उर्फ जावेद शेख और दो पाकिस्तानी नागरिकों अमजदाली राना और जीशान जोहर को आतंकी बताकर ढेर कर दिया था.इशरत जहां केस में पूर्व आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा, पूर्व एसपी एनके अमीन, पूर्व डीएसपी तरुण बरोट समेत सात लोगों को आरोपी बनाया गया जो लंबे समय तक कानूनी शिकंजे में फंसे  रहे हैं।
19 सितंबर 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस के एक फ्लैट में दिल्ली पुलिस के एनकाउंटर को लेकर भी सवाल उठे थे. दिल्ली पुलिस को सूचना मिली थी कि दिल्ली सीरियल ब्लास्ट में शामिल आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन के पांच आतंकी बटला हाउस के एक मकान में मौजूद हैं. सूचना के बाद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा, स्पेशल सेल के एसआई राहुल कुमार सिंह अपनी टीम लेकर बाटला हाउस पहुंच गए.पुलिस को वहां आतिफ और शहजाद के होने की खबर थी। जैसे ही पुलिस ने फ्लैट का दरवाजा खोला, आतंकियों ने फायरिंग कर दी. लगभग 10 मिनट की फायरिंग में 3 आतंकियों को पुलिस ने ढेर कर दिया जबकि आरिज और शहजाद भागने में सफल रहे. इस मुठभेड़ में इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए। एक कांस्टेबल को गोली भी लगी।
सन 2005 में गुजरात के अहमदाबाद में सोहराबुद्दीन शेख का एनकाउंटर किया, वहीं उसके बाद उसके साथी तुलसी प्रजापति का भी एनकाउंटर कर दिया गया.सोहराबुद्दीन शेख पर 2003 में गुजरात के गृहमंत्राी हरेन पंड्या की हत्या और हत्या की साजिश रचने का आरोप था. पुलिस को उसकी तलाश थी लेकिन वह फरार था. शेख को अंडरवर्ल्ड का अपराधी बताया गया था. सन 2007 में अहमदाबाद कोर्ट में पेशी पर ले जाते समय तुलसी को उसके साथी छुड़ाकर ले जाने आए थे. इसी दौरान हुई मुठभेड़ में तुलसी मारा गया था.
मध्य प्रदेश में 8 सिमी आतंकियों का एनकाउंटर सन 2016 में भोपाल की सेंट्रल जेल से 30-31 अक्टूबर की रात भागे आठ सिमी ( स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया) आतंकियों को पहाड़ी पर घेरकर पुलिस ने एनकाउंटर कर दिया था.आतंकियों ने जेल से भागते वक्त एक कांस्टेबल का मर्डर भी किया था. इसके बाद चादर की रस्सी के सहारे फरार हो गए थे.
7 अप्रैल सन 2015 को आंध्र प्रदेश की पुलिस ने राज्य के चित्तूर जंगल में 20 कथित चंदन तस्करों को गोली मार दी थी. पुलिस का कहना था कि पुलिसकर्मियों पर हंसियों, छड़ों, व कुल्हाडि़यों से हमला किया गया और बार बार चेतावनी देने के बावजूद हमले जारी रहे.
जयपुर के स्पेशल आपरेशन ग्रुप ने 23 अक्टूबर सन 2006 को दारा सिंह का एनकाउंटर किया था. दारा सिंह उर्फ दारिया राजस्थान के चुरू का रहने वाला था. उसके खिलाफ अपहरण, हत्या, लूट, शराब तस्करी और अवैध वसूली से जुड़े करीब 50 मामले दर्ज थे. इस एनकाउंटर से कई नेताओं के नाम जोड़े गए थे. एनकाउंटर से पांच दिन पहले पुलिस ने उस पर 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया था. दारा सिंह की पत्नी सुशीला देवी ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए याचिका दाखिल की थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को जांच सौंपी थी।

वही अब विकास दुबे को लेकर भी सीबीआई जांच की मांग विपक्ष व जनसामान्य द्वारा उठाई जा रही है. यह सच है कि विकास दुबे एक दुर्दांत अपराधी था लेकिन क्या उसे अदालत से सजा दिलाने में ठीक वही संशय था कि जिस प्रकार सन 2001 में थाने में तत्कालीन राज्य मंत्राी का मर्डर करने पर भी पुलिस तक ने उसके खिलाफ गवाही नहीं दी और वह बरी हो गया था. क्या यह कमी खुद पुलिस की नहीं है. क्या इसका समाधान केवल एनकाउंटर ही रह गया है. ऐसा ही चलता रहा तो फिर अदालतों की जरूरत ही क्या रह जाएगी? जरा सोचिए!

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