देश सम्पादकीय

हिंदी पट्टी की सत्ता-राजनीति में गैंगस्टरों का बोलबाला

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जनादेश/नई दिल्लीः हाल के दिनों में मिर्जापुर, भौकाल, पाताललोक, रक्तांचल जैसी कई ऐसी रोमांचक वेबसीरीज आई हैं, जिनमें माफिया डॉन और गैंगस्टरों के कारनामे और खूनी खेल दिखाए गए हैं। हिंदी पट्टी खासकर उत्तर प्रदेश के विशाल भूभाग में 1960 का दशक दस्यु और डकैतों के आतंक का दौर था लेकिन धीरे धीरे उनकी जगह गैंगस्टरों और दबंगों ने ले ली. 70 का दशक खत्म होते होते राजनीति का अपराधीकरण शुरू हो चुका था. 90 के दशक में अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुल रहे थे और राजनीतिक और सामाजिक मुक्ति के रास्ते एक ओर बहुसंख्यकवाद से, तो दूसरी ओर नए माफिया के विशाल बाड़ों से बंद हो रहे थे।

80 लोकसभा सीटों और 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सवर्ण जातियों से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर बहुतायत में आए और अपराध और दहशत के नए अंधकार के बीच नेताओं, राजनीतिक दलों और पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे. आजादी के पहले से ही चले आ रहे सामंतवाद, सांप्रदायिक विभाजन, छुआछूत और जातीय शोषण के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, वर्चस्व की लड़ाइयों को जीतने और तात्कालिक और दूरगामी स्वार्थों को हासिल करते रहने के लिए नेताओं ने अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों और जातीय गुटबंदियों में दबंगों और शोहदों को प्रश्रय दिया।

यही दबंग एक समय के बाद अपनी ताकत का दायरा फैलाते हुए गैंगस्टर के रूप में स्थापित होते हैं. उन पर कई संगीन अपराधों के मुकदमे चलते हैं, वे हिस्ट्रीशीटर होते जाते हैं, लेकिन जुर्म की उनकी फाइलें उनके सामाजिक और राजनीतिक दबदबे को और ऊपर उठा देती हैं।इसका सबसे ताजा उदाहरण कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे का है, जो जमानत पर रिहा था और नाटकीय ढंग से गिरफ्तार होने और कथित मुठभेड़ में मारे जाने से पहले, यूपी पुलिस टुकड़ी का सफाया करने का दुस्साहस कर चुका था।

दुबे मुठभेड़ की जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई वाली कमेटी करेगी. मीडिया रिपोर्टो के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि इस जांच से कानून का शासन मजबूत ही होगा और पुलिस का मनोबल नहीं टूटेगा।आखिर ऐसी नौबतें क्यों आ रही हैं जिनसे ड्यूटी पर मुस्तैद पुलिस का ही नहीं, रोजमर्रा के जीवन में जूझते आम नागरिक का भी मनोबल टूटता है, कानून का शासन हिलने लगता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था ही दांव पर लगी नजर आने लगती हैं? क्या आज की राजनीति को इस गैंगस्टर और माफिया संस्कृति से निजात दिलाई जा सकती है? अगर हां, तो कैसे? ये सवाल आज जितने सार्थक और मौजूं दिखते हैं, उतने ही लाचार और निरुपाय भी.
दरअसल, श्रीप्रकाश शुक्ल से लेकर विकास दुबे तक ये लोग न सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था से प्रश्रय पाते हैं, बल्कि वे उसके प्रतीक भी बन चुके हैं. देश के अधिकांश हिस्सों पर इसकी छाप दिखती है. राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे पर बहुत लिखा बोला और अध्ययन किया जा चुका है. आंकड़े तथ्य और मिसालें सब हैं. चुनाव आयोग से लेकर जांच एजेंसियों तक कोई संस्था ऐसी नहीं, जो इस बात से अनभिज्ञ हो और इसके खतरों के बारे में न जानती हों. लेकिन इसे खत्म करना तो दूर, इस पर अंकुश लगाने की कोशिशें भी कामयाब नहीं हो पाईं।

वरना क्या कारण है कि विकास दुबे की हरकतों की जानकारी होने के बावजूद उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई कभी नहीं हुई। बताया जाता है कि दुबे पर 60 से ज्यादा संगीन मामले दर्ज थे।यह भी कहा जाता है कि कुख्याति के दम पर लेकिन उसके निशान पौंछते हुए, दुबे राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते हुए सफेदपोश के खोल में घुस जाने का इंतजार कर रहा था. उसे शायद अंदाजा नहीं था कि उसकी राजनीतिक लालसा और नए वजूद की कामना के ऊपर भी और बड़ी लालसाएं मंडरा रही थीं।

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