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सीवान की चीनी मिल बंद होने के कारण लाखों लोग पलायन को हुये मजबूर

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सरकार की उदासीनता का प्रतीक एसकेजे शुगर मिल

लोगों के जेहन में जब भी विकास की बातें होती हैं तो नाम आता है पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन का

  • आश्वासन की बदौलत वोट लेते रहे जनप्रतिनिधि

  • अबतक की हर सरकार ने जिले को ठगने का किया है कार्य

  • बाहर से पलायन कर आ रहे लोगों की उम्मीदों के किरण बन रहे राजद नेता तेजस्वी यादव

सीवान(जनादेश एक्सप्रेस) ।कोरोनावायरस को लेकर देशभर में जब लॉकडाउन शुरू हुआ, तो मध्यमवर्ग घरों में रहकर खुद को व्यस्त रखने के टिप्स दे रहा था। ठीक उसी वक्त लाखों मजदूर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पैदल मापने के लिए गठरी उठाए सड़कों पर चल रहे थे। इनमें कुछ रास्ते में ही मर-खप गए। कुछ घर लौटे और कुछ अब भी चल रहे हैं।सनद रहे कि ये वो मजदूर हैं, जो शहरों को बसाते हैं, दुनिया को आबाद करते हैं। लेकिन, जब लॉकडाउन हुआ तो उसी शहर, उसी दुनिया ने इन्हें दुत्कार दिया। ऐसे में उन्हें याद आई अपनी मिट्टी की, जो उन्हें दो जून की रोटी न दे सकी।वे सामान और बच्चों को कंधे पर बिठाए लौटने लगे अपने घर। इनमें एक बड़ी आबादी बिहारी कामगारों की थी।

अब बात करते हैं सीवान जिले की। सीवान कभी रोजगार के मामले में आत्मनिर्भर हुआ करता था। यहाँ कई कल-कारखानें एवं फैक्ट्रियां थी, जिसमें लाखों श्रमिक काम करते थे। लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण एक-एक करके सारी फैक्ट्रियां बंद होती गई। धीरे-धीरे मजदूर दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हो गये। जिले में कभी चीनी की तीन मिलें हुआ करती थीं। इससे जिले के किसान गन्ने की खेती कर खुशहाल रहते थे। यहां के किसानों को गन्ने की खेती से नकद पैसे मिल जाते थे, जिससे परिवार चलाना अासान था। चीनी मिल से अन्य रोजगार का भी सृजन होता था। लेकिन, पिछले चार दशकों में एक-एक कर सभी चीनी मिलें बंद हो गईं। अब यह सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया।

अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में इस बार भी यह मुद्दा उठता है या प्रत्याशी इन मुद्दों को छोड़ कर अन्य मुद्दों पर ही वोट मांगने मैदान में उतरेंगे। सन 2005 की लोकसभा में चुनाव प्रचार के दौरान भी मिलों को चालू कराने का आश्वासन दिया था। लेकिन आजतक कुछ नहीं हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उम्मीदें जगी थीं, लेकिन, चीनी मिलों की दशा सुधारने को लेकर कदम नहीं उठाया गया।सीवान नगर के सराय मोड़ स्थित एसकेजी चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1935 में हुई थी। उस समय चीनी मिल का नाम इंडियन शुगर व‌र्क्स था।

1964 में यह मिल नीलाम हुई। इसके बाद श्रीकृष्ण ज्ञानोदय यानी एसकेजी के नाम से इसे दूसरे मालिक ने लेकर चालू किया। यह मिल लगातार 1992 तक चली। इसके बाद फिर बंद हो गई। 2002 में कर्मचारियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में बकाया वेतन भुगतान के लिए मामला दायर किया गया। 2002 में फैसला आया और सरकार को 50 करोड़ बिहार की बंद सभी चीनी मिलों के कर्मचारियों के बकाए वेतन के भुगतान के लिए हाईकोर्ट में जमा करने का आदेश मिला। सरकार ने राशि जमा की। इसमें सीवान की एसकेजी चीनी मिल के कर्मचारियों के बकाए के भुगतान के लिए पांच लाख की राशि मिली। इस राशि से 1997 तक के वेतन का भुगतान किया गया। फिर 2015 में कर्मचारियों के पक्ष में एक आदेश आया।

लिहाजा बड़े अंतराल के बाद फिर राहत मिलने की उम्मीद जागी। लेकिन ये उम्मीद पूरा होने के आश्वासन के साथ ही टूट गई। तब से लेकर आज तक सीवान संसदीय क्षेत्र एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में सभी जनप्रतिनिधि एवं उम्मीदवार इस मुद्दे को भुनाने में जुट गये।

अरुण कुमार (सीवान) बिहार में कल कारखानों की स्थिति नगण्य है। अगर प्रदेश में कल कारखानों को लगाया जाए तो श्रमिक एवं बेरोजगारों का पलायन रुकेगा।सीवान में बंद चीनी मिलों को चालू करने के लिए सरकार को सार्थक कदम उठाना होगा। तभी बिहार आत्म निर्भर बनेगा ।

हालांकि यह मुद्दा सीवान सहित पूरे प्रदेश में एक सपना के रूप में आज भी सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है। मालूम हो कि एसकेजी चीनी मिल में नियमित मजदूरों की संख्या 250, सीजनल 558, अस्थाई या दैनिक वेतनभोगी 300 कर्मचारी कार्यरत थे। इसके अलावा कई क्लर्क, सुपरवाइजर भी कार्यरत थे। जिनमें 60 फीसद सेवानिवृत्त या मर चुके हैं। मात्र 12 ऐसे कर्मचारी हैं, जिनकी सेवा अभी भी है।बेच दी गई जमीन,उपकरण भी गायब

चीनी मिल की जमीन बेचे जाने पर जनप्रतिनिधियों ने भी गुस्सा दिखाया था और बावजूद हरदिया मोड़ स्थित चीनी मिल की जमीन एवं मिल के उपकरण तक बेच दिये गये।

मिलों के बंद होने से बढ़ा पलायन

चीनी मिलों के चलने से इलाके के किसानों में आर्थिक मजबूती का बड़ा माध्यम था।

इंतखाब अहमद (पूर्व वार्ड पार्षद) बिहार में सिर्फ राजनीतिक होती है। अगर बिहार सरकार गंभीरता से कार्य करती तो कई कारखाने बिहार में होते। इससे पलायन रुकता। लोगों को अपने क्षेत्र में ही रोजगार मिल जाता। उन्हें रोजी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की तरफ नहीं जाना पड़ता और परेशानी भी नहीं होती। सिवान में कल-    कारखानों की बहुत संभावनाएं हैं। इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।

हर साल करीब 90 लाख क्विंटल तक गन्ने का उत्पादन होता था। 1980 तक जिले में 15 से 20 हजार हेक्टेयर में तक की गन्ने की खेती होती थी। इसका औसत उत्पादन 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। मिलों की बंदी के बाद किसानों ने गन्ने की खेती करीब-करीब छोड़ दी है। दूसरा रोजगार नहीं होने से यहां के किसान दूसरे राज्यों ने जाकर रोजगार ढूंढ़ने को विवश हैं। जिले के अधिकांश किसान परिवार के युवा दिल्ली, मुंबई सहित अरब देशों में जाकर कमाने काे मजबूर हैं।

खत्म हो रहा मिलों के अवशेष

चीनी मिलों के लंबे समय से बंदी का असर है कि अब उसके अधिकतर उपकरण भी यहां नजर नहीं आते। न्यू सीवान शुगर मिल की चंद दीवारें ही स्मृति शेष हैं। एसकेजी चीनी मिल के भी अधिकतर उपकरण खत्म हो चुके हैं।

सरकार चाहें तो शुरू कर सकती है मिलें

 फनीन्द्र कुमार (डायरेक्टर अमेरिकन इंग्लिश इंस्टिट्यूट)सीवान की तीनों चीनी मिल बंद हो चुकी हैं। अगर जनप्रतिनिधि और बिहार सरकार प्रयास करें तो यह पुनः चालू हो सकती हैं। इससे बेरोजगारों का पलायन रुकेगा और बिहार भी आपको निर्भर बन जाएगा। इसके अलावा भी बिहार में कई संभावनाएं हैं सिर्फ ध्यान देने की जरूरत है।
 एजाज अहमद (शिक्षक)मैं एक इंजीनियर हूं। बिहार में फैक्ट्री नहीं होने के कारण मुझे बाहर नौकरी के लिए जाना पड़ता। मजबूरन मुझे इंजीनियरिंग की डिग्री होने के बावजूद शिक्षण कार्य करना पड़ रहा है। अगर यहां फैक्ट्रियां बनेगी तो मुझे अपने स्किल्ड के मुताबिक काम करने का अवसर मिलेगा।

मजदूरों के प्रति असंवेदनशील रही है सरकार

बिहार मूल के लगभग 36.06 लाख लोग महाराष्ट्र, यूपी, पश्चिम बंगाल, गुजरात, पंजाब और असम में रहते हैं। ये बिहारी मजदूर कई बार दूसरे राज्यों में हिंसा का शिकार हुए और डर कर बिहार लौटे, लेकिन बिहार सरकार इनके लिए रोजगार मुहैया नहीं करा सकी, नतीजतन इन्हें वापस उन्हीं राज्यों का रुख करना पड़ा, जहां से ये भागे थे।साल 2018 में जब गुजरात में बिहारियों के खिलाफ हिंसा भड़की थी और मवेशियों

की ट्रेन के डिब्बों में भरकर ये लौटने लगे थे, तब सीएम नीतीश कुमार ने कहा था, “मैं गुजरात में रह रहे बिहार के लोगों से अपील करता हूं कि वे जहां हैं, वहीं रहें, भले कोई भी घटना हुई हो।” इसी तरह जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लगे अनिश्चितकालीन कर्फ्यू के चलते घाटी में रहने वाले मजदूर 100-150 किलोमीटर तक पैदल चलकर रेलवे स्टेशनों तक पहुंचे थे और किसी तरह घर लौटे। उस वक्त भी न तो बिहार सरकार ने उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने का इंतजाम किया और न ही आश्वासन दिया कि गृह राज्य में ही उनके लिए नौकरी का इंतजाम किया जाएगा

 

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