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यह समय अवसाद का नहीं, बल्कि अभ्युदय का है…

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अभय कुमार/ प्रकृति में कभी भी कुछ भी पीछे नहीं जाता. बीज एक बार उगने के बाद पेड़ ही बनता है कभी छोटा नहीं होता भले ही सूख जाए. नदी एक बार आगे बढ़ने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती, हवा बहती है तो बस आगे ही आगे जाती है, फूल खिलते हैं तो मुरझा जाते हैं पर पुनः कली नहीं बनते. किरण सूर्य से निकलती है तो धरती में समाहित होकर खत्म हो जाती हैं पर वापस नहीं लौटती. समय का रथ लगातार बस आगे ही आगे बढ़ता रहता है कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

फिर इंसान क्यों अतीत में जीता है? क्यों वह हमेशा अपने अतीत से चिपका रहता है, हमेशा पुराने दिनों को याद करता रहता है? आज कोरोना जैसी महामारी के समय में भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा. हम आगे का क्यों नहीं सोचते? हम यह क्यों नहीं सोचते कि यह तो हो गया सो हो गया अब आगे क्या होगा? आगे क्या करना है? भविष्य की संभावनाएं तलाशने की बजाए हम अतीत से क्यों चिपके रहना चाहते हैं? जो जा चुका है, वो किसी भी हाल में कभी भी, किसी भी कीमत पर लौटकर नहीं आएगा. जीवन का हर क्षण नया है, हर चुनौती आगे बढ़ने की एक सीढ़ी मात्र है. यह महामारी भी आई है और गुजर भी जाएगी. अब हमें इस बात पर अपना पूरा का पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि इस बीमारी के साथ या इस बीमारी के बाद कैसे जिया जाएगा. हमें कैसे इसके साथ या इसके बाद अपना नया भविष्य बनाना है.
प्रत्येक क्षेत्र की, प्रत्येक वर्ग की, प्रत्येक व्यवसाय की अपनी-अपनी समस्याएं हैं. बिल्कुल ही अलग-अलग और सबको अपनी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इस समस्या का हल तलाशने में ध्यान केंद्रित करना चाहिए. नए दौर में इस बीमारी के साथ भी हम कैसे और अधिक तेजी से तरक्की कर सकें, इसके रास्ते ढूंढने चाहिए. दूध फट जाने पर कुछ लोग अपनी किस्मत को कोसते हुए उसे फेंक देते हैं तो कुछ लोग उसमें शक्कर मिलाकर मिठाई बना लेते हैं. हमारे सामने दोनों विकल्प हैं; या तो इस महामारी से बर्बादी की कगार पर खड़े हम अपने जीवन, अपने व्यवसाय का रोना रोते रहें या इसी में से कुछ सीख कर एक नई राह बना कर और तरक्की करने का प्रयास करें।

मनुष्य यूं ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति नहीं माना जाता. उसने बड़ी से बड़ी आपदाएं देखी हैं और उन सब से बाहर निकल कर आज भी जीवित है, आज भी इस प्रकृति का एक अंग है. समय के साथ तालमेल बिठाने की मानव की क्षमता अद्भुत है, असीमित है. यह समय कोरोनावायरस के कारण जीवन में आए मुश्किलों को स्वीकार कर उससे आगे बढ़ने का है. मानवता के लिए यह समय अवसाद का नहीं, बल्कि अभ्युदय का है.

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