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विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यशैली पर लगा प्रश्नचिंह?

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नई दिल्लीः विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्ल्यूएचओ) और उसके लीडर डॉ.टेडरोस अधानोम गेब्रियेसस इस समय दुनिया के निशाने पर हैं। डॉ.टेडरोस एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं और इथियोपिया के स्वास्थ्य मंत्राी रह चुके हैं। भूमंडलीय संकट का कोरोना काल कथित वैश्विक संस्थानों को अपनी कसौटी पर कसने निकल पड़ा है। मानव जाति की सेहत की चिंता करने के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अस्तित्व में आया विश्व स्वास्थ्य संगठन बड़े सवालों के दायरे में आ गया है. उस पर कोरोना की महामारी को लेकर न केवल ढुलमुल रवैया अख्तियार करने बल्कि आपराधिक लापरवाही बरतने के आरोप लग रहे हैं।
अपनी स्थापना के बाद से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हैजा, मलेरिया, चेचक, छोटी माता जैसी गंभीर बीमारियों का सामना किया. फिलहाल विश्व स्वास्थ्य संगठन एड्स, इबोला और टीबी जैसी खतरनाक बीमारियों की रोकथाम पर काम कर रहा है। यह सदस्य देशों के स्वास्थ्य मंत्रालयों के साथ मिलकर काम करता है. किसी भी किस्म की स्वास्थ्य आपदाओं में विश्व स्वास्थ्य संगठन से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बिना किसी पक्षपात के समय रहते कारगर कदम उठाए. कोरोना मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन निष्पक्ष नहीं रह पाया है।
चीन के वुहान में कोरोना वायरस के प्रकट होने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन की जिम्मेदारी संसार को इस नए वायरस की चेतावनी देनी थी मगर संगठन ने दिसंबर और जनवरी माह में इस विषय पर सटीक सूचना व सलाह संसार के देशों को नहीं दी. चीन में दिसंबर में प्रकट हुआ कोरोना वायरस मनुष्य से मनुष्य में फैल सकता है, इसको लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन पर स्वयं भ्रम में रहने या फिर सुनियोजित भ्रम फैलाने का गंभीर आरोप है।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वायरस की खबर मिलने के बाद जब उन्होंने चीन पर यात्रा पर प्रतिबंध लगाने की बात की तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए सामने आ खड़ा हुआ. अगर प्रतिबंध न लगे होते तो अमेरिका में कोरोना से मरने वालों की संख्या में लाखों का इजाफा होना तय था।
नवंबर, 2019 में वुहान और इस दुनिया में एक अज्ञात बीमारी के चर्चे थे लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया. 31 दिसंबर, 2019 को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को सूचित किया कि उसके 41 नागरिक निमोनिया से पीडि़त हैं हालांकि निमोनिया के कारण अज्ञात है. चीन के वुहान इलाके में संक्रमण फैल गया था, इसके बावजूद विगत 14 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि शुरूआती जांच में कोविड-19 के मनुष्य से मनुष्य में संक्रमण का कोई सुबूत नहीं मिला. इसे महामारी भी उसने बहुत बाद में 11 मार्च को घोषित किया. तब तक 114 देशों के 1.18 लाख लोग संक्रमित हो चुके थे।
सितंबर, 2019 मंे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘ए वर्ल्ड एट रिस्क‘ नाम की अपनी रिपोर्ट में ‘एक्स‘ नाम की बीमारी के बारे में चेतावनी देते हुए लिखा, ‘यह दुनिया तेजी से फैलने वाली घातक महामारी के लिए तैयार नहीं है.‘ वर्ष 1918 के स्पेनिश फ्लू के आतंक को याद कराते हुए उसने चेतावनी दी थी कि वैसी ही एक महामारी से दुनिया भर में 5 से 8 करोड़ मौतें हो सकती हैं लेकिन जैसा कि बाद में मालूम चला, पूर्व चेतावनी के अनुरूप पहले से कोई तैयारी नहीं थी।
सिर्फ दिखाने के लिए ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का अस्तित्व है. वास्तव में उसके पास न तो संकटकाल से लड़ने और संकट काल से बाहर निकलने के लिए कोई कार्यक्रम हैं और न ही सशक्त नीतियां हैं. डब्लूएचओ के बड़े-बड़े अधिकारी सिर्फ अपने भाषणों और सेमिनारों में ही रोगों से लड़ने और रोगों से जीवन बचाने की वीरता दिखाते हैं. दुनिया के अमीर देशों के खरबों रूपए हासिल कर उनका इस्तेमाल सिर्फ ऐशो आराम करने और सुविधाएं भोगने के लिए करते हैं। गंभीर बीमारियों के प्रति सिर्फ रिपोर्ट के प्रकाशन मात्रा से अपने कर्तव्य का इतिश्री मान लेने की खतरनाक परंपरा डब्लूएचओ में वर्षों से जारी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का संविधान इस विश्व संस्था को महामारी और दूसरी बीमारियों को निर्मूल करने की दिशा में काम करने तथा वैश्विक स्वास्थ्य के मामले में दिशा-निर्देश देने वाले तथा तालमेल बनाने वाले प्राधिकरण के तौर पर काम करने का अधिकार देता है। कोरोना संक्रमण जैसी गंभीर, जानलेवा बीमारी से लड़ने के लिए जहां भी कोरोना का तांडव जारी है, वहां पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की उपस्थिति जीवनदायिनी की तरह होती है लेकिन वुहान के खुलासे के 100 दिन बाद, जब दुनिया इस महामारी से जूझ रही है, इसकी जांच और इसके इलाज के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोई दिशा-निर्देश नहीं रहा. जब कोरोना जैसी बीमारी के भयानक तांडव काल में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास कोई बचाव कार्यक्रम तक नहीं है तो फिर ऐसे संगठन पर खरबों रूपए खर्च करने की क्या आवश्यकता है?
डोनाल्ड ट्रंप ने सीधेतौर पर कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन सिर्फ कागजी शेर है. सिर्फ बयानों और कागजों में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन बीमारियों से लड़ने की वीरता दिखाता है. हमारे डॉलर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारी भोगविलास करते हैं, दुनिया की सैर कर अपनी भोग मानसिकताओं को तुष्ट करते हैं. जब हम कोरोना से लड़ रहे हैं और हमारे नागरिक अपना जीवन खो रहे हैं तो ऐसी स्थिति में विश्व स्वास्थ्य संगठन हाथ पर हाथ धर कर बैठा है। सबसे बड़ी बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चीन से मिलीभगत करने का आरोप लगाया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर सीधा सवाल दागा है कि कोरोना से संबंधित रिसर्च और उस रिसर्च से जुड़े डॉक्टरों व अन्य विशेषज्ञों के गायब होने का सिलसिला जब चल रहा था तो विश्व स्वास्थ्य संगठन बंसी बजा रहा था? यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि कोरोना को इंटरनेशनल हेल्थ इमरजेंसी घोषित करने का निर्णय लेते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन कई दिन तक किंतु परंतु में क्यों लगा रहा? डोनाल्ड ट्रंप विश्व स्वास्थ्य संगठन के कामकाज पर सवाल उठाने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं. उसकी आलोचना अनेक वैश्विक मंचों पर हो रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन पर यह आरोप लग रहा है कि उसने वैश्विक पटल पर बीमारियों और महामारियों पर निगाह रखने वाले वॉच डॉग की अपनी भूमिका अदा नहीं की।
सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन के नौकरशाही के ढांचे और महाशक्तियों के उखाड़-पछाड़ को दोष देना गलत होगा। दरअसल इनमें नैतिक अनिवार्यताओं का अभाव है जो इनके गठन के बाद से अब तक बरकरार है। इसके अलावा परिचालन के ढांचे, निर्वाचित और चुने गए नेतृत्व, भू-राजनीतिक चुनावों का लाभ उठाने वाले जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं जो वोटों की सनक के आगे बेबस हैं।

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