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मढ़ौरा के बाबू रामजीवन सिंह ने जंगे-ए आजादी शहादत दे लिखी थी इबारत

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मढ़ौरा के बाबू रामजीवन सिंह ने जंगे-ए आजादी शहादत दे लिखी थी इबारत

👉अगस्त क्रांति के ध्वजवाहक बाबू रामजीवन सिंह की शहादत अविस्मरणीय

मढ़ौरा : अगस्त क्रांति की चिंगारी से मढ़ौरा की क्रांतिकारी धरती अछूता नहीं रहा और बाबू रामजीवन सिंह की शहादत ने आजादी के दीवानों के कलेजा में जल रही आग में घी का काम किया और मढ़ौरा-अमनौर में इसकी लपटें बिहार की झांसी की रानी कहे जाने वाली रामस्वरूपा देवी उर्फ बहुरिया जी के अगुआई में ऐसी क्रांति का आगाज किया कि इस क्रांतिकारी धरती का लोहा अंग्रजो को मानना पड़ा।वैसे तो अगस्त क्रांति की आग पूरे देश मे 9 अगस्त से ही फैली थी ।लेकिन मढ़ौरा की क्रांतिकारी धरती ने महथा गाछी में 18 अगस्त 1942 को जो इतिहास रचा,उसकी मिशाल कम ही मिलती है।जहां पर 18 अगस्त को आजादी की मांग को लेकर मढ़ौरा समेत आसपास के वासियों की सभा मे अमनौर की बहुरिया ने संबोधित कर रही थी ।इस बात की भनक अंग्रेज सिपाहियों को लग गई और सभा की भीड़ पर अंग्रेज सिपाहियों ने धावा बोल दिया।यहां तक कि सभा मे जुटे निहत्थे लोगों पर बंदूक से फायरिंग भी की गई।जिसमें मढ़ौरा प्रखंड के लेरुआ गांव के निवासी 18 वर्षीय उच्च विद्यालय मढ़ौरा के छात्र राम जीवन सिंह को बर्बर अंग्रेजी हुकूमत के सिपाहियों के गोली का शिकार होना पड़ा और देश की आजादी के लिये उन्होंने अंग्रेज सिपाहियों के बंदूक की गोली को सीने से लगा अपनी शहादत दे दी।लेकिन मढ़ौरा के लोगों ने अपना प्रतिरोध जारी रखा और कहा जाता है कि पांच अंग्रेज सिपाहियों को लोगों ने खदेड़ कर ईंट-पत्थर व लाठी डंडे से कुचल कर मार डाला।जिसमें स्थानीय महिलाओं की बड़ी भूमिका बताई जाती है।कहा जाता है कि सभा के लोगो ने अंग्रेज सिपाहियों को जब प्रतिरोध में खदेड़ा तो कुछ अंग्रेज सिपाही बस्ती के नजदीक धान की हो रही रोपनी वाले खेतों से भागे।जहां पर उनकी पैर गीले खेतों में धंस जा रहे थे।

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इस मौके को देख आसपास के पुरुष और महिलाओं ने पांच अंग्रेज सिपाहियों को ईंट पत्थर व लाठी-डंडे से मार पांच अंग्रेज सिपाहियों को मौत की नींद सुला दी।फिर उन लाशों को ठिकाने लगाने के लिये भी लोगों ने हिम्मत से काम लिया और बैलगाड़ी पर लाद सभी लाशों को अमनौर के रास्ते गंडक नदी में ले जाकर डुबो दी और ऐसे लाशों को ठिकाना लगाया कि फिरंगियों को ढूढ़ने से भी नहीं मिल पाई।इस संघर्ष का श्रेय अमनौर के बहुरिया जी को जाता है।जिन्होंने उक्त कांड में बौखलाए अंग्रेजो के दमनकारी नीति के खिलाफ संघर्ष की ऐसी मिशाल पेश की की उन्हें बिहार की लक्ष्मीबाई कहा जाने लगा।