सम्पादकीय

लड़ते लड़ते साथ रहना शिवसेना-भाजपा की बड़ी पुरानी आदत है

332 00 Views
अभय कुमार —
साल 2013, जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर चर्चा तेज थी और नरेंद्र मोदी का नाम चर्चाओं के बाजार में सबकी जुबान पर था। उस वक्त शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने अपनी ओर से सुषमा स्वराज का नाम आगे बढ़ाया था। हालांकि नरेंद्र मोदी के चेहरे पर राजग ने 40 दलों को साथ लेकर चुनाव लड़ा व अभूतपूर्व जीत दर्ज की। साल 2019 देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के मातोश्री में बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए सूबे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यह ऐलान करते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा 25 व शिवसेना 23 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी। फडणवीस के बगल में खड़े भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे इस दौरान मुस्कान भरते नजर आ रहे होते हैं। हालांकि इस दौरान उद्धव ठाकरे के चेहरे के भाव से उनका पुराना दर्द भी बयां हो रहा था और उन्होंने ज्यादा वक्त खामोशी के साथ ही गुजारा।
लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस जहां-जहां थोड़ी कमजोर हैं वहां-वहां ये दोनों पार्टियां क्षेत्रीय क्षत्रपों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। बिहार में राजद, रालोसपा, हम और कांग्रेस का महागठबंधन अभी आकार ही ले रहा था तभी भाजपा ने जनता दल (यू) और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ सीट शेयरिंग का ऐलान करते हुए सभी मतभेद की अटकलों पर विराम लगा दिया। वहीं महाराष्ट्र में कांग्रेस और राकांपा के बीच कई महीनों से गठबंधन पर सहमति की खबरों के मध्य ही पिछले पांच सालों में भाजपा के खिलाफ विद्रोही तेवर अपनाने वाली शिवसेना से लोकसभा चुनाव में सीटों का समझौता कर भाजपा ने यहां भी यह साफ कर दिया कि आगामी चुनाव में राजग का कुनबा छोटा तो कतई नहीं होगा। पिछले पांच सालों में कोई ऐसा मौका नहीं आया होगा जहां शिवसेना ने भाजपा पर जुबानी हमले नहीं किये हों। चाहे वो प्रियंका गांधी की राजनीति में इंट्री का मामला हो या दिल्ली में भाजपा के खिलाफ हुई रैली का मामला हो।
महाराष्ट्र की लोकसभा की 48 सीटों में से पिछली बार भाजपा ने 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि शिवसेना ने 18 सीटों को अपने नाम किया था। दोनों को मिले मत प्रतिशत पर नजर डालें तो शिवसेना को 20.6 प्रतिशत जबकि भाजपा को 27.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। वहीं कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए शिवसेना ने 19.4 प्रतिशत व भाजपा ने 27.8 प्रतिशत मत हासिल किए थे। तीन राज्यों में मिली पराजय और हिन्दी भाषी राज्यों से सीटों की कमी होनी की स्थिति में शिवसेना के साथ भाजपा का गठबंधन वक्त की मजबूरी भी था और जरूरत भी था।
बता दें कि बीते दिनों चुनावी रणनीतिकार और जदयू के नए खेवनहार प्रशांत किशोर ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से उनके आवास पर मुलाकात की थी जिसमें पार्टी के सभी सांसद मौजूद थे। हालांकि प्रशांत किशोर ने शिवसेना और भाजपा के गठबंधन में किसी भूमिका की खबरों को कैमरे के सामने खारिज कर दिया था। लेकिन किशोर ने शिवसेना के साथ आगामी लोकसभा व विधानसभा चुनाव में रणनीतिक मदद देने पर चर्चा भी की थी। शिवसेना भी यह अच्छी तरह जानती है कि प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस और राकांपा गठबंधन से टक्कर लेने के लिए उसे भाजपा का साथ जरूरी है।
बात अगर भाजपा की करें तो 2014 से 2019 के बीच सहयोगियों से पार्टी के रिश्ते भले ही कभी तकरार कभी इकरार वाले रहे हों लेकिन पहले बिहार में जदयू व लोजपा को एकजुट करने के बाद लगातार हमलावर रही शिवसेना को साथ लाकर भाजपा ने साफ कर दिया कि पार्टी अपने कुनबे के महत्वपूर्ण सहयोगियों को सम्मान देने के लिए तैयार है। बहरहाल लोकसभा का मामला तो सुलझ गया है लेकिन विधानसभा को लेकर पेंच अभी भी फंसा है। भाजपा की ओर से 50-50 के फार्मूले पर चुनाव लड़ने के लिए दोनों दलों में सहमति की बात कही जा रही है। लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों के बीच मामला अटका है। मुख्यमंत्री को लेकर शिवसेना 1995 वाले फार्मूले यानि सीटें किसी की भी ज्यादा आये लेकिन मुख्यमंत्री शिवसेना का ही मुख्यमंत्री होगा, पर कायम है। ऐसे में दोनों आने वाले समय में ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले पर सहमति बना लें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि दोनों पार्टियां एक दूसरे के बगैर चुनाव में जाने के नुकसान को भली-भांति समझती हैं। शिवसेना की ओर से आए इंटरनल सर्वे में भी अकेले चुनाव लड़ने की सूरत में भाजपा से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचने की बात से भी पार्टी अवगत है। ऐसे में विधानसभा चुनाव में भी दोनों के बीच आम सहमति बनने की गुंजाइश भरपूर है और वैसे भी सियासत तो गुंजाइश से ही शुरु होती है।