झारखंड

भारत की बड़ी चुनौती , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र की गैरबराबरी है

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भारत की आजादी के आगे-पीछे स्वतंत्र हुए ज्यादातर देश जब सैन्य और नागरिक तानाशाहियों के शिकार हुए भारत के नेतृत्व ने लोकतंत्र को कमजोर नहीं होने दिया. आजादी के बाद से ही भारत के जनगण ने लोकतंत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाते हुए उन तमाम प्रयासों को नकार दिया जो स्वतंत्रता को सीमित करने के मकसद से अमल में लाने की पहल की गयी. भारत का संविधान ही शक्ति का वह स्रोत है, जो लोकतंत्र की चेतना को व्यापक बनाने का आधारतत्व प्रदान करता है. जीवंत संविधान जहां लोकतंत्र की गारंटी देता है, वहीं समाज के सभी तबकरों को अपनी आकांक्षाओं के अनुकूल जीवन हासिल करने की ताकत भी प्रदान करता है.

बावजूद हमें गणतंत्र दिवस पर इस तथ्य को याद रखना चाहिए कि संविधान के शिल्पकार बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने संविधान के लोकार्पण के बाद चेतावनी देते हुए कही थी. डा. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान राजनीतिक बराबरी तो देता है. एक व्यक्ति एक वोट महत्वपूर्ण है. उन्होंने इसके बाद चेतावनी दी थी कि यदि आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी को दूर नहीं किया जाएगा तो देश को भारी कीमत चुकानी होगी. इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दुनिया भर में पिछले कुछ समय में असमानता बहुत गंभीर होती गयी है.

भारत इसका अपवाद नहीं है. भारत की मुख्य चुनौती अब भी आर्थिक और समाजिक क्षेत्र की गैरबराबरी है. इसके कारण समाज के विभिन्न तबकों में आक्रोश है. भारत ने 1991 के बाद जिन आर्थिक नीतियों को अपनाया है, उससे गंभीर हालात पैदा हो गए हैं. इस कारण सामाजिक गैरबराबरी भी गंभीर होती गयी है. इसका असर समाज और देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिख रहा है. पिछले दशकभर से भारत के वंचित जनसमुदायों का असंतोष बहुत गहरा गया है. भारत की राजनीति जिस तरह कॉरपोरेट घरानों के आगे नतमस्तक है, उसका असर आमजन के सशक्तिकरण पर भी पड़ रहा है.

मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने दुनियाभर की गैरबराबरी का अध्ययन कर बताया है कि भारत सहित दुनिया भीषण असमानता का शिकार होती जा रही है. पिकेटी ने भारत की असमानता को भी गंभीर और चिंताजनक बताया है. अभी हाल ही में ऑक्सफेम ने रिपोर्ट जारी कर इस असमानता को रेखांकित किया है. दुनियाभर में इस असमानता ने आमजनों में असंतोष पैदा किया है. इस कारण भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में दक्षिणपंथी विचारों के विभाजनकारी एजेंडा को मूल दिया जा रहा है. भारत में इसका असर संविधान पर भी दिखता है. भारत में संविधान की रक्षा का आंदोलन तेज हुआ है. अनेक राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने संविधान की प्रस्तावना को आधार बनाते हुए सामाजिक गैरबराबरी और न्याय के प्रभावित पहलुओं के संदर्भ में हाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उसे संविधान के मूल विचार पर प्रहार बताया है. इसके साथ ही देश में यह विमर्श भी खड़ा हुआ है कि भारत का संविधान एक अनमोल धरोहर है, जो अपनी वैचारिकता के साथ लोकतंत्र की चेतना को विस्तारित करता है. संविधान की प्रस्तावना संविधानवाद का आधार तत्व है, जो राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने की गारंटी देता है. संविधानवाद का यह विचार देश राजनीति और धर्म के अंतरसंबंधों के अलगाव की बात करता है. लेकिन देखा जा रहा है कि भारत में संविधानवाद की इस मूल अवधारणा के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी की जा रही है. संविधान ने राज्य के सेकुलर होने पर जोर दिया है. राज्य किसी भी धर्म विशेष का पक्ष नहीं ले सकता है. बावजूद इसके भारत के सेकुलर तानेबाने पर थियोलॉजिकल प्रभाव से ग्रहस्त किए जाने का प्रयास किया जा रहा है. भारत की आजादी की लड़ाई के समय ही यह आम समझ विकसित हुई थी कि भारत एक प्रगतिशील और सेकुलर अवधारणा का गुलदस्ता है, जो हजारों रंगबिरंगे गुलाबों को खिलने की गारंटी करता है. भारत के संविधान निजी स्वतंत्रता की गारंटी भी प्रदान करता है. लेकिन पिछले कुछ समय से महसूस किया जा रहा है कि निजी स्वतंत्रता पर राज्य दखल देने का प्रयास कर रहा है.

गणतंत्र दिवस वह अवसर है, जो हमें संविधान की प्रस्तावना के अनुकूल आचरण करने की प्रतिबद्धता का संकल्प प्रदान करता है. साथ ही तमाम तरह की गैरबराबरी को खत्म करने के लिए राजनीति को सतर्क करता है.

 

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