छपरा का एक गांव : जहां जीवन-यापन के लिए करते थे चोरी-डकैती,अब कर रहे हैं शराब का अवैध कारोबार

जनादेश/छपरा (सारण) : जिले के एक गांव में एक ऐसी बस्ती जहां लोग जीवन यापन के लिए चोरी डकैती करतें थे और अब कर रहे हैं शराब निर्माण का प्रतिबंधित काम.ये बातें कोई और नहीं कह रहा हैं, बल्कि खुद उस बस्ती के अवैध कारोबारियों के आश्रित परिवार वालें पुलिस और ग्रामीण जनता के सामनें दमनात्मक कारवाई के समय बोल रहे थे.इससे साफ स्पष्ट होता हैं कि आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें बदली लेकिन जीवन यापन के लिए क्रियान्वित योजनओं के लाभ से आज भी कुछ मुहल्ले और बस्ती अछूते रह गये हैं. ये बस्ती सारण जिले के इसुआपुर प्रखंड का उसरी कलां गांव का नट बस्ती हैं.जहां पर शनिवार को पुलिस प्रशासन के अनजाने में आजिज ग्रामीणों ने इन शराब निर्माण के अवैध कारोबारियों के अड्डे पर धावा बोला था.
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जिसमेंअर्ध निर्मित शराब और निर्माण के सामग्री को बरामद कर पुलिस को सौंपा.मौके पर पहुंची पुलिस ने जब घरों के आसपास छापेमारी शुरू की तो बस्ती की महिलाओं ने मुखर विरोध करतें हुये धंधे पर पुलिस की दमनकारी कारवाई के पर जो कही, वो विकास की ढिंढोरा पीटने वाली सरकार के मुंह पर तमाचा से कम नहीं था. बताया जाता हैं की बस्ती की महिलाएं साफ-साफ बोल रही थी की पहले इस बस्ती के लोग चोरी-डकैती कर जीवन यापन कर रहे थे तो प्रशासन के दमनात्मक कारवाई के बाद अब शराब के पेशा से परिवार का भरण पोषण करना शुरू किया.फिर भी सरकार, पुलिस प्रशासन और ग्रामीण इस शराब निर्माण के खिलाफ अभियान चलाकर परेशान कर रहे हैं.मालूम हो की ये मामला तब जोड़ पकड़ा हैं, जब शराब कारोबारियों के खिलाफ गांव के लोग अभियान चला रहे हैं.हाल में बताया जाता हैं की इस बस्ती के लोग कुता के भौंकने से रोकने के लिए खाद्य चीजों में जहर मिला कर गांव में जहां तहां रख दिया, जिससे बहुत ही पालतू कुते मर गये.मरे कुत्तों के सड़ांध से गांव वालें परेशान हो आक्रोशित हो गये और पुलिस पर शराब के अवैध धंधे के खिलाफ कारवाई का दबाव बनाया हैं.पहले भी नब्बे के दशक में इस बस्ती का आतंक आसपास के गांवो में इस कदर फैली थी कि लोग अपने घरों में चैन से नहीं सो पाते थे.उस समय ये भी कहा जाता था की इस बस्ती को शासन के पहरुआ से उच्च संरक्षण प्राप्त हैं.इसलिए लोग दबे जुबान चर्चा तो करतें थी लेकिन खिलाफत की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे.किसी तरह रातजगा कर अपनी संपति की रक्षा करतें थे.कालांतर में इस पेशा के खिलाफ पुलिस ने कारवाई की.जिससे नट बस्ती के लोगों को  अपनी पुश्तैनी पेशा से मुंह मोड़ने को विवश होना पड़ा.जिसमें कहा जाता हैं कि बहुत सारे लोग जो चोरी-डकैती के पेशा में लिप्त थे अपनी ठिकाना बदल लिया या फिर शराब के धंधे में लिप्त हो गये.इधर दो वर्षो से बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद इस पेशा से भी गांव वालों कि परेशानी बढ़ी हैं.जिसकों लेकर ग्रामीण शराबबंदी कानून के तहत कारवाई चाहते हैं और पुलिस प्रशासन पर इसके लिए दबाव बनाये हुये हैं.इस हालात में नट बस्ती कि फिर से परेशानी बढ़ गयीं हैं.लेकिन जीवन यापन के विकल्प नहीं सूझने से नट बस्ती के लोग पुलिसिया कारवाई के खिलाफ अपनी मुखालफत भी महिलाओं को सामनें लाकर कर रहे हैं.मामला जो भी हो इस बस्ती पर पूर्व के चोरी-डकैती के पेशा की चर्चा क्षेत्रों में आज भी गाहे-बीगाहे होती ही रहती हैं.सरकार को चाहिये की ऐसे बस्ती के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए स्वरोजगार के लिए पहले प्रशिक्षण दे,फिर आर्थिक मदद से प्रोत्साहित करें.ताकि लोग सम्मानपूर्वक अपना स्वरोजगार कर जीवन यापन कर सके.