क्या सचमुच आपातकाल से भी खराब है यह आफतकाल?

अभय कुमार —

 

मुद्दा. आपातकाल को भले ही गलत माना जाता हो, किन्तु पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की इस बात के लिए तो तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने आपातकाल जैसा जो भी निर्णय किया, खुलेआम किया, लेकिन अब हालात यह हैं कि कथनी और करनी में बड़ा अंतर है? जो सामने प्रत्यक्ष प्रदर्शित किया जा रहा है और जो पर्दे के पीछे अप्रत्यक्ष चल रहा है, उसमें जमीन-आसमान का फर्क है. शायद इसीलिए, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी का कहना था कि- पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का बहुत पछतावा था, लेकिन आज की स्थिति तो 1975-77 के हालात से भी ज्यादा गंभीर है!

उनका मानना था कि- अगर विपक्ष एकजुट हो जाए और हर सीट पर भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले अपना एक उम्मीदवार उतारने के सिद्धांत का पालन करे तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोका जा सकता है.

न्यायिक प्रणाली के भीतर खतरा, विषयक आयोजित सत्र में उनका कहना था कि- 1975 में बेहतर और निश्चित विपक्ष था, परन्तु आज विपक्ष बिखरा हुआ है. मैं कह सकता हूं कि- इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच अंतर यह है कि इंदिरा गांधी को अपने किए का पछतावा था, किन्तु आज कोई पश्चाताप नहीं है!

उनका कहना था कि- आपातकाल 19 माह में खत्म हो गया था, लेकिन आज तो आज संस्थानों को कमजोर करने की कोशिश लगातार जारी है. इसलिए मुझे लगता है कि आज की स्थिति 1975-77 के हालात से भी ज्यादा गंभीर है.

शौरी का कहना था कि- नरेन्द्र मोदी जब 2014 में लोकप्रियता के शीर्ष पर थे, तब उन्हें कितने वोट मिले थे? मात्र 31 प्रतिशत. इसलिए अगर विपक्ष एकजुट होता है तो उसकी शुरुआत 69 प्रतिशत मतों के साथ होगी?

प्रसिद्ध पत्रकार शौरी की बातों में दम है, क्योंकि इस बार भी प्रेस के साथ आपातकाल जैसे कदम उठाने के प्रयास किए गए थे, हालांकि बाद में अपने ही निर्णय पर सभी बैकफुट पर थे, संभवतया इंदिरा गांधी जैसा करने की चाहत तो रही, परन्तु उनके जैसे साहस का अभाव रहा?