उपेक्षाओं का शिकार होता जा रहा प्रसिद्ध बनियापुर पशु मेला

जनादेश/बनियापुर(सारण)|बनियापुर का बैलहट्टा मेला बुधवार से प्रारंभ हो गया।प्रदेश के अलग-अलग जिलो से बैलो का आने का सिलसिला शुरू हो चूका है।वही बैलो के खरीददार भी मेले की ओर पहुँचने लगे है।बैलहट्टा मेले में काफी संख्या में बैलो के पहुँचने से स्थानीय लोग भी काफी उत्साहित है।लगभग एक पखवारे तक चलने वाले इस मेले में भाड़ी संख्या में मवेशियों की खरीद-बिक्री होती है।जिसमे सीमावर्ती यू.पी प्रदेश के बलिया जिले से भी काफी संख्या में व्यपारी पहुँचते है।मेले में बैलो के अलावे घोड़े की भी बिक्री होती है।सोनपुर पशु मेला से लौटने के क्रम में भी लोग अपने मवेशियों के साथ बनियापुर बैलहट्टा मेले पहुँचते है।हालाँकि बैलहट्टा मेला की समाप्ति के बाद आम लोगो के लिये तीन महीने तक मेले का आयोजन रहता है।जिसमे लकड़ी के बने फर्नीचर,मीना बजार,सर्कस,मौत का कुआँ,ऊनी वस्त्र एवं पौधों की नर्सरी का व्यापक पैमाने पर बाजार लगता है।वही गुड़ से बने जलेबी के लिये पुरे जिले में बनियापुर मेला जाना जाता है।अल्पकालीन ही सही लेकिन स्थानीय लोगो के लिये भी मौसमी रोजगार का सृजन इस मेले में होता है।जिससे पुरे साल लोगो को इस मेले का इंतजार रहता है।
उपेक्षा का शिकार है बनियापुर मेला
कई दशक पूर्ब से लग रहे बनियापुर मेला आज भी समय के अनुकूल उपेक्षा का शिकार है।मेलार्थियों और व्यपारियों को ध्यान में रख न तो प्रसाशनिक स्तर पर कोई तैयारी की जाती है नहीं स्थानीय स्तर पर।
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आलम यह है की मवेशी की खरीददारी करने पहुँचने वाले व्यपारियो को एक अदद पीने के पानी के लिये भी यत्र-तत्र भटकना पड़ता है।वही सुरक्षा के दृष्टि से भी मेलार्थियों में भय व्याप्त रहता है।अपने जान-माल की सुरक्षा को लेकर व्ययपारी चिंतित दिखते है।न तो व्यपारियो के ठहरने का कोई प्रबंध है न ही रात में लाईट की कोई व्यवस्था है।अपने संसाधन के बल पर मवेशी स्वामी टेंट और पाल टांगकर मेले में रात बीताने को विवश है।